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Showing posts from April, 2019

मायके का मान आपके हाथो में है।

सेजल की २४ वर्ष में शादी तय हो गई।सब कुछ अच्छा था ।खासकर लड़का अतुल  बहुत ही हैंडसम था।सेजल का सपना था कि उसे हीरो जैसा वर मिले।इसलिए उसने भी हामी भर दी थी। शादी के लिए अभी ६ महीने बाकी थे। उस बीच सेजल और अतुल का मिलना- मिलाना चालू था। सुनहरे दिनों का वे बहुत आनंद ले रहे थे।अतुल, सेजल को महंगे महंगे उपहार देता था।जो सेजल को अच्छे लगने लगे। उसने अपनी मां से कहा...' अब मुझे  ऐसा लग रहा है, कि मुझे भी अतुल को कुछ महंगा उपहार देना चाहिए।' मा ने कहा....' उपहार देने में कोई परेशानी नहीं, किन्तु महंगा होना जरूरी नहीं होना चाहिए।' सेजल गुस्से से बोली क्या....' मा, तुम हमेशा कंजूसी की बाते करती हो।मेरा उपहार महंगा होगा तो ससुराल में मेरी इज्जत होगी।' सेजल ने एक ना सुनी और महंगा उपहार अतुल को दे दिया। शादी का दिन भी दिन आ गया।धूमधाम से दोनों की शादी हुई। अतुल सेजल हनीमून के लिए विदेश गए।सेजल तो खुशी से सातवे आसमान पर थी।उसे लगा की उसके सारे सपने पूरे हो गए। ससुराल आई तो धीरे- धीरे उसे  वास्तविकता   प...

खिचड़ी

राज  की तबियत पिछले २ दिनों से खराब थी।बहुत बुखार और खासी थी।कमजोरी की वजह से वह ऑफिस नहीं जा पा रहा था।उसने छुट्टी ले ली और रविवार की छुट्टी तो थी ही। राज की पत्नी  भावना   भी तीन दिन राज के साथ  ही रही।दवा देना,राज को जो खाने की इच्छा होती, वो उसे बना कर देती।तीन दिन वो भी कहीं नहीं गई ।बस राज के सिरहाने बैठी रहती। करीब २ महीने बाद भावना की तबीयत खराब हो गई।राज तुरंत उसे डॉक्टर के पास ले गया।कमजोरी बहुत थी इसलिए वह खाना तक नहीं बना पा रही थी। राज ने अपनी मां को फोन किया और बताया कि भावना की तबीयत खराब है। तब मा ने कहा बेटा जब तुम बीमार हुए तब बहू ने तुम्हारा बहुत ध्यान रखा ,अब तुम्हारी  बारी है। राज ने कहा मा मै फोन स्पीकर पे करता हूं तुम भावना से बात कर लो। मा ने कहा ...'भावना बेटी तुम आराम करो ,अपना ध्यान रखना।' तभी राज बोला ....' हा....मा.. मै भी भावना को यही कह रहा हूं, कि आज वो सिर्फ खिचड़ी बना ले और कुछ नहीं।' मा ने कहा ..ये तुम क्या कह रहे हो ,भावना की तबीयत ठीक नहीं ।तो क्या तुम दो दि...

अब नहीं होंगे गर्मी की छुट्टियों में बच्चे बोर

 गर्मी की छुट्टियों का इंतजार बच्चों को बेसब्री से होता है ।पूरे साल में यही वे दिन होते हैं जब वे बिना किसी टाइम टेबल के समय बिताते हैं । लेकिन गर्मी की छुट्टियां आते ही ,बच्चों के मम्मी और पापा परेशान से हो जाते हैं। उनकी सबसे बड़ी यही परेशानी होती है ,कि  बच्चों को पूरा दिन कैसे व्यस्त रखा जाए??? क्योंकि  बच्चे ज्यादातर समय अपना इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स जैसे कि मोबाइल ,लैपटॉप ,टीवी आदि में दे देते हैं । तो चलिए आप सभी के लिए मैं कुछ सुझाव लाई हूं ,आशा करती हूं कि यह सुझाव आपके बच्चों के जरूर काम आएगा। गर्मी की छुट्टियों में बच्चों को किसी  टाइम टेबल  के तहत ना बांधे । गर्मी की छुट्टियों में बच्चों के लिए  आपका साथ  सबसे ज्यादा जरूरी होता है। बच्चों को प्रकृति से मिलाएं आपके आसपास यदि कोई  नर्सरी  है तो आप बच्चों को वहां ले जा सकते हैं ।जहां वे नए -नए पौधों के बारे में, इनडोर -आउटडोर प्लांट्स के बारे में जानकारी पा सकते हैं ।उनके मनपसंद  पौधों को घर लेकर आए और उसमें पानी डालने की जिम्मेदारी बच्चे क...

सदा सुखी रहो।

उम्र करीब 60 साल  ,5 फुट का कद,पतला सा शरीर, सफेद बालों को छुपाने के लिए लगाया  हुआ  काला रंग (जो माथे पर भी थोड़ा- थोड़ा लगा हुआ था।  पीले फूलों वाली साड़ी पहने सावित्री शायद दिलों के भाव चेहरे पर ना आए ऐसी कला  जान चुकी थी । इकलौता बेटा विकास उससे दूर दूसरे शहर में रहता था लेकिन सावित्री ने कभी शिकायत नहीं की। सावित्री ने अपने इकलौते बेटे को  डॉक्टर बनया।  बेटे की   शादी को ३ साल हो चुके थे।इन ३ सालों में वह अपनी ही दुनिया में मगन था। उसे अपना भविष्य बनाना था। मां से कभी- कभार फोन पर जरूर बात कर लिया करता था।  लेकिन मां की ममता हमेशा यही कहती ...मेरा बेटा कितना अच्छा है... मेरे बारे में कितनी फिक्र करता है ।सावित्री को कभी ऐसा लगा ही नहीं कि धीरे-धीरे इन ३ सालों में उसका  बेटा दूर हो चला था ।क्योंकि सावित्री ने कभी उससे  कुछ कहा ही नहीं ।उसे यह लगता ररहा कि  बस उसका बेटा और  बहू हमेशा खुश रहे । आज जब सावित्री का बेटा विदेश जाने की तैयारी कर रहा था, तब सावित्री से रहा ना गया । सावित्री ...

गरम गरम रोटी

रमन ने कमरे से आवाज लगाते हुए कहा .. 'शिखा ,आज मुझे ऑफिस जल्दी जाना है। 9:00 बजे ही निकलने की सोच रहा हूं।  शिखा रोज  सुबह 6:00 बजे उठकर खाने की सारी तैयारियां कर लेती थी। बच्चे को स्कूल भेजकर ,अपनी योगा क्लास जाती। वहां से आकर रमन का टिफिन भर देती थी ।लेकिन जैसे ही रमन ने कहा उसे जल्दी जाना है उसने अपनी  योगा मेट साइड में रख दी और रमन के टिफिन की तैयारी करने लगी। दूसरे दिन रविवार  था । शिखाने रसोई घर से ही आवाज लगाते हुए कहा ...'  रमन,चलो ....खाना खा लो। मैं गरम-गरम रोटियां सेक रही हूं । रमन ने कहा ...'आज तो रविवार है, साथ में खाना खाएंगे ना ।'  शिखा ने कहा ...'रोज टिफिन में तुम ठंडा ही तो खाते हो ।रविवार का  एक ही दिन तो मिलता है, जब तुम्हें गरम रोटियां खाने मिल सके।' रमन रसोई घर में आया उसने शिखा के हाथ से बेलन ले लिया। उसे डाइनिंग टेबल की कुर्सी पर बैठा कर कहा । 'तुम मुझे समय पर टिफिन देने के लिए अपनी योगा क्लास तक छोड़ देती हो ।' 'रोज तुम भी तो बनी हुई रोटियां खाती हो। हमे...

कितने अलग लेकिन कितने करीब

बालकनी में बैठे हुए गुलाब और मोगरे के फूलों को निहारते हुए अजय और प्रगति झूले में बैठे  कुछ सोच रहे थे। दोनों एक साथ बोल पड़े  '  1७ साल ...' दोनों मुस्कुराए । प्रगति बोली ...'अजय ,लगता ही नहीं हम दोनों की शादी को 1७ साल हो गए।'  अजय ने कहा...' हां सचमुच ऐसा लगता है ,बस कल परसों की ही तो बात है कि हम मिले थे।' उनका 1५ साल का बेटा राहुल  भी वहां पर आ गया .। उसने कहा...' मम्मी -पापा मैं आपसे एक बात पूछूं?' दोनों ने कहा....' हां, हां! राहुल क्या बात है ???पूछो ना' राहुल बोला ..'मम्मी -पापा आप दोनों एक दूसरे से कितने अलग हो ।पापा हैं कि  ज्यादा बातें नहीं करते और मम्मी आप कभी चुप नहीं रहती ।पापा को बाहर घूमना पसंद नहीं और मम्मी को बाहर जाना अच्छा लगता है।मम्मी आप छोटी-छोटी बातों में हंस देती हो और पापा तो  अच्छा चुटकुला सुनाने पर भी सिर्फ मुस्कुरा देते हैं।'  क्या आप दोनों सचमुच एक दूसरे के साथ खुश हो? आपके बीच कभी  झगड़ा भी नहीं होता। 'तब अजय और प्रगती एक दूसरे को देख कर...

दिलो की दूरियां

खूबसूरत सी सोसायट  में अंजली और राहुल ने  एक घर खरीदा था।दोनों बहुत खुश थे।दोनों ही नए विचारों के थे। नौकरी की वजह से वे दोनों अपने परिवार से दूर रहते थे। सारे रिश्तेदार यही सोचते कि अंजली और राहुल दोनों को घर वालो की पड़ी नहीं है।अपनी ही दुनिया में मस्त है।सास ससुर और ननद की कोई सुध नहीं लेते। राहुल की बड़ी बहन  रमा दीदी विधवा थी।इसलिए वो अपने मायके में  मा -पिता के साथ रहती थीं। अंजली चाहती थी कि वो नए घर में पूजा करवाए।इसलिए उसने अपने ससुराल वालों को बुला लिया। सत्यनारायण की पूजा बहुत अच्छे से हो गई।नए घर में सारा सामान भी लग गया।अच्छा मुहूर्त देखकर रसोई में चूल्हा शुरू करना था।इस दिन सासु मा ना कहा कि सबसे पहले चूल्हे पे खीर या हलवा बनाना चाहिए। अंजली ने हलवे के लिए सारा सामान रसोई घर में रख दिया । और रमा दीदी को आवाज़ देकर बुलाया। अंजली बोली ' दीदी चलिए आप ही इस घर की रसोई में पहली बार गैस चालू कीजिए ।रमा दीदी आश्चर्य में पड़ गई । दीदी बोली अरे अंजली मै कैसे?????? तुम सुहागन हो ,तुम ही ...

12 घंटों का वृद्धाश्रम

आर्यन 5 साल का हो चुका था। वह अपने आप को पूरी तरह से अपने मम्मी -पापा के हिसाब से एडजस्ट कर चुका था ।रोज सुबह होते ही दौड़- दौड़ कर मम्मी -पापा उसे तैयार करते और उसे स्कूल छोड़ देते।  स्कूल भी ऐसी चुनी थी, जो 8:00 बजे शुरू होती है और 3:00 बजे जाकर खत्म होती ।3:00 बजे स्कूल से छूटते ही आर्यन की मेड आ जाती और उसे डे केयर में छोड़ देती ।जो करीब राटके  8:00 बजे तक होता । आठ  बजे  तक वहां मम्मी या पापा आ जाते ,जो आर्यन को घर ले जाते। सुबह के ८ से रात के ८ पूरे 12 घंटों में आर्यन ने क्या किया... यह बताने के लिए बस उसके पास 10 मिनट ही होते ,क्योंकि तब तक मम्मी -पापा  थक चुके होते  और आर्यन खुद भी थक के बस सो जाता । यही दिनचर्या थी उन सब की 12 घंटे मम्मी- पापा काम करते और 12 घंटे आर्यन  किसी और की निगरानी में रहता। बेशक आर्यन की मम्मी -पापा ने उसके लिए एक बहुत ही बेहतरीन स्कूल  चुना था और डे- केयर भी ऐसा  जो   होटल से कम नहीं था। उसे कोई तकलीफ नहीं होती थी।  लेकिन आर्यन अपना बचपन  खोन...

मामा का घर.....

यदि आज से 20-25  साल पहले हम जाए ,तो हमें याद आता है कि कैसे अप्रैल और मई के महीने में हम सारे बच्चे अपने नाना-नानी के ,अपने मामा के घर जाने के लिए किस तरह अधीर हो उठते थे । सारी माएं अपने सूटकेस ऐसे बांधती थी जैसे कि एक मुक्त आकाश में उड़ने का मौका उन्हें दोबारा मिल रहा हो। मामा का घर मानो पूरी स्वतंत्रता , ढेर सारी खुशियां, ढेर सारी मस्ती का पर्याय बन जाता था। फोन नही होते थे ,लेकिन पत्र के द्वारा  मामा हमें बुलाया करते थे ।उन्हें हमारा इंतजार होता था। मम्मी भी पापा की सारी तैयारियां ठीक से  कर देती थी। स्टेशन पर गाड़ी रुके उसकी पहले हमारी नजर मामा को ही ढूंढा करती थी। सुबह के 5:00 बजे हो या रात के 12 ,स्टेशन पर मामा लेने जरूर आते थे ।उनका मुस्कुराता चेहरा देख मम्मी की सारी थकान मानो हवा में छू हो जाती थी। हम उछलकर उनकी गोद पर गिर जाते और उन्हें ऐसा लगता  जैसे कि उनका घर हमसे ही तो है।  सारा सामान अपने ही कंधे पर उठाकर हमें घर तक ले जाते ।नाना -नानी ,मामी ,सारे बच्चे हमारे इंतजार में खड़े रहते। फिर क्या  मस्ती,मज़ाक ,हल्ला गुल्ल...

मैं निर्दोष हूं।

बाहर  धीरे -धीरे से चल  रही हवा चुपके  से  घर के भीतर आ रही थी। खिड़की के  सुनहरे पर्दे, उस हवा से हिल रहे थे ।हवा के साथ धूल ने भी घर के फर्नीचर पर अपनी जगह बना ली थी  ।सोफे पर रिमोट यूं ही पड़े हुए थे। खाने की मेज, कुछ साफ तो कुछ मैली सी थी।  घर का हर एक सामान अपनी- अपनी जगह पर जमा हुआ था । सोनाली अपने कमरे में अपने बिस्तर को छोड़ ,एक कोने में जाकर, अपने माथे को अपने घुटनों पर रखकर रो रही थी। उसके घुंघराले बालों से उसका चेहरा ढका हुआ था ।हाथों में सोने की एक -एक चूड़ी गुमसुम सी लग रही थी ।पैरों में लगाई हुई एक महीने पहले की नेल पॉलिश थोड़ी लगी थी और थोड़ी निकल चुकी थी।  सोनाली के रोने के कारण उसकी आंखें लाल तो हो ही गई थी और उसकी आंखों का काजल उसके गाल तक फैल चुका था। माथे पर लगी लाल बिंदी सरक कर  मांग तक पहुंच गई थी।   सोनाली का गला सूख चुका था ।सिसकियां  लेकिन अब भी कमरे  के सन्नाटे में  आसानी से सुनाई दे रही थी । अपने आंसुओं को सोनाली कभी अपने हाथ से तो कभी अपने दुपट्टे से ...

एक और मौका तो दो ज़िन्दगी को.....

'नहीं करनी है... मुझे शादी। ' 'कितनी बार कहा है ...कितनी बार तुम्हें समझाया है...  मां !मुझे शादी नाम से नफरत है । '  'अब मुझसे  कभी तुम शादी करने के लिए प्लीज मत कहना.... क्योंकि मैं दोबारा वही गलती नहीं करना चाहती ।' संगीता ने बहुत ही गुस्से में यह बात अपनी मा से कहीं।  मां उसके लिए शादी का एक रिश्ता लेकर आईं थीं ।  संगीता की मां ने कहा ....' ऐसे नहीं होता.... माना कि भगवान है तेरे साथ एक बार बुरा किया ।पर जरूरी नहीं कि ऐसा दुबारा हो ।यह रिश्ता बहुत अच्छा है ।तेरे चाचाजी कह रहे थे कि सचमुच बहुत ही अच्छा लड़का है ।वह तुम्हें  बहुत प्यार करेगा ।बहुत सुखी रहोगी तुम ।एक बार तुम उससे मिल तो लो ।इस तरह जिद नहीं करते ।' मां .....मुझे किसी लड़के से नहीं मिलना ।मैं जान चुकी हूं कि हर एक आदमी ,एक औरत को सिर्फ अपने पैरों की जूती समझता है, इससे ज्यादा कुछ भी नहीं। मैं अपनी जिंदगी अब दोबारा नर्क में नहीं डालना चाहती ।मुझे बख्श दो मां ।  मां का दिल मानने को तैयार नहीं। वह फिर से उसके सामने कह...

अस्तित्व की तलाश में कहां खो गई?????

मुंबई के जाने-माने रिहायशी इलाके में ,20 मंजिला इमारत की 15वी  मंजिल पर रहने वाली  मनीषा  अपने पति  दिलीप , अपने दो प्यारे बच्चे  और सास ससुर के साथ रहती थी। आने वाला हर  दिन उसे ऐसा लगता मानो उसके लिए बोझ हो। ऐसा नहीं था कि दिलीप उसे प्यार नहीं करता था, या सांस और ससुर उसके साथ दुर्व्यवहार करते थे। या पैसों की कोई कमी थी, लेकिन कहते हैं इंसान जब तक खुद की खुशी समझ नहीं पाता। बस उसके लिए वह खुशी एक मृगतृष्णा बन कर रह जाती है।  मनीषा के साथ भी कुछ ऐसा ही था। सब कुछ था उसके पास।  लेकिन न जाने क्या था...  जिसकी उसे तलाश थी?????  हर दूसरे दिन उसकी आंखों में आंसू होते। सारी रात जागकर न जाने क्या सोचा करती थी??? कई बार अपने दोस्तों से मिलती ,अपना दुख हल्का करती । लेकिन उसके परेशानी की वजह कोई जान ही नहीं पाया ।  उसकी खुशी कहां है ??आखिर वह क्या चाहती है ??उसे पता ही नहीं था। समय यूं ही बीत रहा था। उसने अपनी जिंदगी को बेमानी मान ही लिया था। बस मन ही मन घुट- घुट कर जी रही थी । उसकी ही इमारत में एक नए...

चलिए मनाए यह त्यौहार...

यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि भारत त्योहारों का देश है। भारत में हर दूसरे दिन, देश के किसी न किसी क्षेत्र में कोई ना कोई त्योहार मनाया जाता है । यदि देखें तो दिवाली ,दशहरा ,होली ,नवरात्रि, रक्षाबंधन ,गुडीपाडवा संक्रांति,ईद और बहुत सारे त्यौहार भारत देश में मनाये जाते हैं । हम सभी बढ़ चढ़कर ,बहुत  जोश के साथ इन  त्योहारों को मनाते हैं।  हम नए कपड़े पहनते हैं। घर को खूब सजाते हैं ।मिठाईयां बनाते हैं। एक दूसरे को तोहफे देते हैं ।ढेर सारी फोटो खींचते हैं। बहुत मजे करते हैं ।ऐसा लगता है मानो इस त्यौहार को मनाने के बाद एक नई स्फूर्ति आ जाती है। ऐसा विश्वास होता  है, मानो आने वाले दिन बहुत ही सुखद होंगे ।इन सभी त्योहारों को अपने परिवार के साथ मनाने के लिए हम बहुत प्लानिंग भी करते हैं। आज देश को जरूरत है एक ऐसा त्यौहार को मनाने की ,जिसे  यदि भारत की जनता पूरी सूझबूझ और इमानदारी से मनाए  तो देश के हर एक नागरिक का कल्याण होगा।  वह त्यौहार है चुनाव में अपने मत देने का ( वोट देने का) . .... जी ! ....मैं बात कर रही  हूं...

रात के खाने में क्या बनाऊं???? एक राष्ट्रीय समस्या

रात के खाने में क्या बनाया जाए??? इसे  एक राष्ट्रीय समस्या घोषित कर देना चाहिए।  हर एक घर में शाम होते ही मम्मी की आवाज शुरू हो जाती है, आज खाने में क्या बनाऊं ??? फोन करके पति को पूछा जाता है ..आज खाने में क्या खाओगे???  यह बात और है कि पत्नी बनाती वही है ,जो वह चाहती है ।लेकिन पूछना मानो उसका नियमित कर्म हो   ।वह सिर्फ यह सुनना चाहती है कि...कोई यह कह दे कि खिचड़ी बना लो । लेकिन मजाल है जो घर का कोई भी  सदस्य  यह कह दे कि..आज खिचड़ी बना लो।  बच्चों से पूछा जाए तो बच्चे कहते...' मम्मी कुछ  अच्छा बनाना आज'   बहुत दिन हो गए ...बस कुछ अच्छा बना लो मम्मी आज । पतिदेव को पूछो तो  पतिदेव कहते हैं ...' जो बनाना हो बना लो.... सब चलेगा '(क्योंकि जनाब, पतिदेव पत्नी की आदत से अब पूरी तरह से वाकिफ हो चुके हैं)  इस बात से पत्नी कभी संतुष्ट नहीं होती, दोबारा पूछती है । कुछ भी का क्या मतलब होता है??? कुछ तो बताओ  । रोज  यही पूछना पड़ता है। मैं भी परेशान ह...

काले पन्ने फाड़ दिए..

मिश्रा परिवार की बड़ी बहू ,देवर और  ननद की लाडली भाभी, राजीव की जीवनसंगिनी , एक मासूम से बच्चे की मा ,नर्सरी में पढ़ाने वाली प्यारी सी प्रियंका टीचर... अपनी छोटी सी जिंदगी मे बहुत खुश थी । ससुराल में उसे इतना प्यार ,सम्मान मिला, जिसके सपने हर एक लड़की देखती है ।जहां उसे बड़ी बहू होने के नाते परिवार के हर छोटे-बड़े निर्णय लेने का हक मिला ।वहीं राजीव ने उसे नौकरी करने और अपने सपनों को पूरा करने की हिम्मत दी। आज प्रियंका अपनी इस जिंदगी से इतनी खुश थी जैसे मानो कभी कुछ हुआ ही नहीं था।   लेकिन ऐसा नहीं था....  आज से 5 साल पहले प्रियंका इस शादी के बिल्कुल खिलाफ थी । यह शादी उसके लिए मरने से भी बदतर थी। ना  राजीव  उसे पसंद था, ना राजीव के परिवार वाले।  उसे शादी नाम से ही नफरत हो गई थी ।परिवार वालों ने प्रियंका को बहुत प्यार से समझाया उसे मनाया तब कहीं जाकर प्रियंका  शादी करने के लिए तैयार हुई थी। प्रियंका के सास- ससुर  प्रियंका को इतना प्यार करते , उसे  सम्मान देते और राजीव उसे पलकों पर रखता तो फिर क्यों ...

मेरी गोद भराई

अभी जब अप्रैल का महीना चल रहा है ,तो मुझे याद आती है मेरी गोद भराई।  अप्रैल के ही महीने में आज से 15 साल पहले मेरी गोद भराई की गई थी।  मेरे ससुराल वाले और मायके वाले सभी बहुत खुश थे । गोद भराई की हर एक रस्म को बहुत अच्छे से अदा किया गया था । मेरे मायके से मेरे लिए एक लाल रंग की सितारे जड़ी हुई साडी आई थी । जिसे पहनना उस गर्मी के मौसम में एक बहुत बड़ा काम था मेरे लिए। फिर भी मैंने उस साडी को पहनकर सारी रस्में पूरी की। आज भी उस साड़ी को  ,मैं जब देखती हूं तो खुशी से झूम उठती हूं ।उस साड़ी में  तस्वीरो को  देखकर मुझे बहुत अच्छा लगता है । हमारे यहां गोद भराई में  देवी जी की पूजा की जाती है । जिसकी गोद भराई की जा रही है उसे सारी रात देवी जी की पूजा के मंडप के सामने ही रहना पड़ता है ।दूसरे दिन जब उस पूजा का उद्यापन  होता , तभी वह साड़ी बदल सकती है । यह सोच कर दो मैं बुरी तरह से डर गई थी ।  तापमान जहां 40 को क्रॉस कर गया था  ,वही वह सितारे जड़ी साडी में मै सारी रात  कैसे रहूंगी???मेरे पति भी परेशान और मैं भी बहुत परेशान थी।...

मां ....ये कौन है???

दिनेश ,रंजीता से बेइंतहा मोहब्बत करता था। लेकिन कभी अपने प्रेम का इजहार ना कर पाया । ऐसा नहीं था कि दिनेश को मौका नहीं मिला, लेकिन कहते हैं ना कि   प्यार का इजहार करना इतना आसान भी नहीं होता।  ऐसा नहीं था कि रंजीता को अपने प्यार के बारे में बताने के लिए दिनेश ने कभी कोई कोशिश नहीं की ।कभी जब रंजीता कॉलेज नहीं आती ,तो दिनेश अपने नोट्स उसे जा कर दे आता था ।आते-जाते जब रंजीता को रिक्शा नहीं मिलता तो दिनेश ही तो था ,जो उसे घर तक छोड़ा आता था । रंजीता को उसके जन्मदिन पर सरप्राइज पार्टी भी तो दिनेश ने ही दी थी । पर रंजीता कुछ भी नहीं समझ पाई। उसे तो लगता था  कि दिनेश सिर्फ एक उसका अच्छा दोस्त है ।उससे ज्यादा कुछ भी नहीं।  दिनेश के दोस्तों ने भी उसे कई बार कहा था, रंजीता  से तुम अपने मन की बात कह दो ।ऐसा ना हो कि बाद में तुम पछताते रह जाओ।  दिनेश ने अपने प्यार का इजहार करने के लिए सैकड़ों खत लिखे, लेकिन कभी उन खतो को रंजीता को ना दे पाया ।उसे डर था कि रंजीता उसके प्यार को ना समझ सके और उसे ठुकरा दे तो??? आज पूरे 5 सा...

अधूरी कहानी.... क्या आप करेंगे इसे पूरी???

रमन और सरिता की शादी बड़ों की रजामंदी के साथ बहुत ही धूमधाम से हुई थी ।सरिता एक संयुक्त परिवार की लड़की थी इसलिए उसे रमन के संयुक्त परिवार में घुलने -मिलने में ज्यादा समय नहीं लगा। महीने दो महीने में ही रमन के परिवार को उसने अपना परिवार बना लिया ।सुबह 5:00 बजे की उठती और रात 12:00 बजे तक काम करती। लेकिन कभी उफ़ नहीं करती। रमन को सरिता में सिर्फ यही बात अच्छी लगती कि वह घर के सभी लोगों की मन लगाकर सेवा करती थी ,लेकिन पुराने ख्यालात का होने वाला रमन कभी भी सरिता को वह मान -सम्मान नहीं दे सका जो एक पत्नी को मिलना चाहिए। उसकी नजरों में सरिता घर की बहू थी ,जो घर की चार दीवारों में रहकर घर की शोभा तो बढ़ा सकती थी ,लेकिन घर के बड़े-बड़े निर्णय लेने का हक तो घर के केवल मर्दों को ही था। वहां सरिता का एक भी शब्द बोलना रमन को बिल्कुल अच्छा नहीं लगता था। इस बात पर कई बार रमन सरिता पर चिल्लाया और सभी के सामने उसका अपमान भी किया ।फिर भी सरिता ने अपना नसीब समझ कर सब कुछ चुपचाप अपना लिया।  सरिता और रमन का एक प्यारा सा बच्चा भी हो गया। सरिता का मन उस बच्चे की वजह से ससुराल में लगने लग...