बाहर धीरे -धीरे से चल रही हवा चुपके से घर के भीतर
आ रही थी। खिड़की के सुनहरे पर्दे, उस हवा से हिल रहे थे ।हवा के साथ धूल ने भी घर के फर्नीचर पर अपनी जगह बना ली थी ।सोफे पर रिमोट यूं ही पड़े हुए थे। खाने की मेज, कुछ साफ तो कुछ मैली सी थी।
घर का हर एक सामान अपनी- अपनी जगह पर जमा हुआ था ।
सोनाली अपने कमरे में अपने बिस्तर को छोड़ ,एक कोने में जाकर, अपने माथे को अपने घुटनों पर रखकर रो रही थी।
उसके घुंघराले बालों से उसका चेहरा ढका हुआ था ।हाथों में सोने की एक -एक चूड़ी गुमसुम सी लग रही थी ।पैरों में लगाई हुई एक महीने पहले की नेल पॉलिश थोड़ी लगी थी और थोड़ी निकल चुकी थी। सोनाली के रोने के कारण उसकी आंखें लाल तो हो ही गई थी और उसकी आंखों का काजल उसके गाल तक फैल चुका था। माथे पर लगी लाल बिंदी सरक कर मांग तक पहुंच गई थी।
सोनाली का गला सूख चुका था ।सिसकियां लेकिन अब भी कमरे के सन्नाटे में आसानी से सुनाई दे रही थी ।
अपने आंसुओं को सोनाली कभी अपने हाथ से तो कभी अपने दुपट्टे से पोछ लेती। लेकिन फिर भी अपने आंसुओं पर रोक ना लगा पाती तो दर्पण में खुद को निहारती और खुद से कहती...' मत रो सोनाली..... तेरा कोई दोष नहीं... तू क्यों रोती है ???चुप हो जा पगली ...चुप हो जा।'
अभी भी उसके कानों में सास के वही शब्द गूंज रहे थे कि ....
"तुझमें न जाने हमने क्या देखा और इस घर की बहू बना लिया ।तू इस घर को एक संतान तक नहीं दे सकती। हमारे तो भाग्य की फूट गए... तेरे जैसी बहू को इस घर में लाकर । हमारे बेटे को तो तुझसे कई गुना अच्छी लड़कियों के रिश्ते आए थे। ऐसी लड़की किस काम की जो बच्चा ना पैदा कर सके।"
विषैले तीर की तरह सास के यह शब्द सोनाली के कलेजे को आरपार चीर गए। शादी के दस साल हो चले थे और अभी तक सोनाली की गोद हरी नहीं हुई थी। सोनाली और उमेश अपनी गृह स्थी को आगे बढ़ाना चाहते थे ।वे अपनी एक संतान चाहते थे। लेकिन ऐसा हो नहीं पाया और बच्चे के इंतजार में दस साल हो गए।
बच्चा नहीं हो पाया , उस बात का जिम्मेदार सिर्फ सोनाली को माना गया। रिश्तेदार ,पड़ोसी ,दोस्त ...सबने सबसे पहले उंगली उठाई तो सोनाली पर।
सोनाली भी सब कुछ सुनती रही। कभी कुछ पलट कर जवाब नहीं दिया। लेकिन आज उसने तय किया कि वह अब चुप नहीं रहेगी।
उमेश सोनाली के साथ हमेशा से था और उसने सोनाली से कहा भी था कि लोगों के सवाल का जवाब उमेश देगा ,लेकिन फिर भी सोनाली ने अपनी कसम देकर उमेश को हमेशा चुप करवा दिया ।
लेकिन आज उसके स्वाभिमान को ऐसे ठेस लगी कि वह कमरे में बंद होकर आंसू तो बहाती रही... लेकिन अब उसके आंसू अंगार बन चुके थे।
उसने अपने आप को संभाला और तेज़ कदमों के साथ अपने सास-ससुर के कमरे में जा पहुंची ..।
दस सालों से जो उसकी मन के भीतर लावा जमा हुआ था ,आज उसने उसे निकाल दिया ।
उसने कहा ....."मम्मी- पापा मैं जानती हूं कि आपका सपना आपके पोता -पोती को देखने का है। लेकिन मैं आज आपको यह बताना चाहती हूं कि आप मुझे कोसते रहे ।मुझे रिश्तेदारों के बीच बेइज्जत करके रहे, लेकिन आज आपको यह जानकर और भी ज्यादा दुख होगा कि मैं आपको पोता -पोती देने के लिए पूरी तरह से स्वस्थ हूं ।लेकिन कमी आपके बेटे में हैं ।आपका बेटा आपको दादा -दादी नहीं बना सकता ।मुझे आपके बेटे से कोई परेशानी नहीं। मैं उनके साथ सारी जिंदगी बिताना चाहती हूं ।
क्या हुआ जो हमारी संतान नहीं होगी ???लेकिन मैं उनके साथ बहुत खुश हूं। लेकिन आप लोगों में मेरा जीना इस तरह दूभर कर दिया है कि आज मुझे आपके सामने की बात कहनी पड़ रही है। एक बहू को बांझ कह देना कितना आसान होता है..... लेकिन क्या आप इस बात को स्वीकार कर पाएंगे कि आपका बेटा आपको वारिस देने के काबिल नहीं?????

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