'शिखा ,आज मुझे ऑफिस जल्दी जाना है। 9:00 बजे ही निकलने की सोच रहा हूं।
शिखा रोज सुबह 6:00 बजे उठकर खाने की सारी तैयारियां कर लेती थी। बच्चे को स्कूल भेजकर ,अपनी योगा क्लास जाती। वहां से आकर रमन का टिफिन भर देती थी ।लेकिन जैसे ही रमन ने कहा उसे जल्दी जाना है उसने अपनी योगा मेट साइड में रख दी और रमन के टिफिन की तैयारी करने लगी।
दूसरे दिन रविवार था । शिखाने रसोई घर से ही आवाज लगाते हुए कहा ...' रमन,चलो ....खाना खा लो। मैं गरम-गरम रोटियां सेक रही हूं ।
रमन ने कहा ...'आज तो रविवार है, साथ में खाना खाएंगे ना ।'
शिखा ने कहा ...'रोज टिफिन में तुम ठंडा ही तो खाते हो ।रविवार का एक ही दिन तो मिलता है, जब तुम्हें गरम रोटियां खाने मिल सके।'
रमन रसोई घर में आया उसने शिखा के हाथ से बेलन ले लिया। उसे डाइनिंग टेबल की कुर्सी पर बैठा कर कहा ।
'तुम मुझे समय पर टिफिन देने के लिए अपनी योगा क्लास तक छोड़ देती हो ।'
'रोज तुम भी तो बनी हुई रोटियां खाती हो। हमें तो हर रविवार को तुम गरम रोटियां खिलाती हो ।पर तुम्हें कभी गरम रोटी मिलती ही नहीं ।'
इसलिए आज मैं रोटी बनाउगा और तुम खाओ।
हम लोगों को तो तुम हमेशा कहती हो गरम रोटियां अच्छी लगती है ,बहुत स्वादिष्ट होती हैं ।
माना कि मुझे रोटी बेलनी नहीं आती पर आज मैं कोशिश जरूर करूंगा। गरम -गरम रोटी जितनी मुझे अच्छी लगती है , उतनी ही अच्छी तुम्हें भी तो लगती होगी।
उस दिन शिखा ने अपने पति के हाथों से बनी हुई गरम-गरम रोटियों का आनंद लिया ।बेशक रोटियां गोल नहीं थी, लेकिन उसमें पति की फिक्र, पति के प्यार का एहसास जरूर शामिल था।जो उन रोटियों को और भी स्वादिष्ट बना रहा था।
(इस रचना को पढ़ने के लिए आप सभी का बहुत -बहुत धन्यवाद। आपको कब गरम रोटियां खाने के लिए मिली हैं ?यह मुझे जरूर बताइएगा। आप मुझे फॉलो भी कर सकते हैं)

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