रमन और सरिता की शादी बड़ों की रजामंदी के साथ बहुत ही धूमधाम से हुई थी ।सरिता एक संयुक्त परिवार की लड़की थी इसलिए उसे रमन के संयुक्त परिवार में घुलने -मिलने में ज्यादा समय नहीं लगा। महीने दो महीने में ही रमन के परिवार को उसने अपना परिवार बना लिया ।सुबह 5:00 बजे की उठती और रात 12:00 बजे तक काम करती। लेकिन कभी उफ़ नहीं करती।
रमन को सरिता में सिर्फ यही बात अच्छी लगती कि वह घर के सभी लोगों की मन लगाकर सेवा करती थी ,लेकिन पुराने ख्यालात का होने वाला रमन कभी भी सरिता को वह मान -सम्मान नहीं दे सका जो एक पत्नी को मिलना चाहिए। उसकी नजरों में सरिता घर की बहू थी ,जो घर की चार दीवारों में रहकर घर की शोभा तो बढ़ा सकती थी ,लेकिन घर के बड़े-बड़े निर्णय लेने का हक तो घर के केवल मर्दों को ही था।
वहां सरिता का एक भी शब्द बोलना रमन को बिल्कुल अच्छा नहीं लगता था। इस बात पर कई बार रमन सरिता पर चिल्लाया और सभी के सामने उसका अपमान भी किया ।फिर भी सरिता ने अपना नसीब समझ कर सब कुछ चुपचाप अपना लिया।
रमन को सरिता में सिर्फ यही बात अच्छी लगती कि वह घर के सभी लोगों की मन लगाकर सेवा करती थी ,लेकिन पुराने ख्यालात का होने वाला रमन कभी भी सरिता को वह मान -सम्मान नहीं दे सका जो एक पत्नी को मिलना चाहिए। उसकी नजरों में सरिता घर की बहू थी ,जो घर की चार दीवारों में रहकर घर की शोभा तो बढ़ा सकती थी ,लेकिन घर के बड़े-बड़े निर्णय लेने का हक तो घर के केवल मर्दों को ही था।
वहां सरिता का एक भी शब्द बोलना रमन को बिल्कुल अच्छा नहीं लगता था। इस बात पर कई बार रमन सरिता पर चिल्लाया और सभी के सामने उसका अपमान भी किया ।फिर भी सरिता ने अपना नसीब समझ कर सब कुछ चुपचाप अपना लिया।
सरिता और रमन का एक प्यारा सा बच्चा भी हो गया। सरिता का मन उस बच्चे की वजह से ससुराल में लगने लगा ।लेकिन रमन का बात-बात पर उसका अपमान करना, उसे पसंद नहीं आता था।
सरिता की तबीयत अचानक से खराब होने लगी । रमन को यह बात बिल्कुल अच्छी नहीं लगी ।रमन उसे कहता "तू तो बीमार हो गई है ,तेरे जैसी बीमार पत्नी का मैं क्या करूं??? हर दूसरे दिन तेरा इलाज कराना पड़ता है। तेरे बाप को कहना पड़ेगा एक बीमार लड़की हमारे मत्थे मढ़ दी उन्होंने ।"
सरिता ने कहा..." ऐसी कोई बात नहीं ,डॉक्टर ने कहा है मैं जल्दी ठीक हो जाऊंगी ।मुझे एलर्जी हो गई है जिसकी वजह से शरीर में दाने निकल आए हैं और शरीर सूज गया है ।
रमन को सरिता की सूरत देखना अच्छा नहीं लगता था और सरिता भी इतनी फुर्ती से घर के काम नहीं कर पाती थी जैसे पहले किया करती थी ।
रमन का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया था और उसने एक दिन सरिता से कह दिया कि .."जब तक तू पूरी तरह से ठीक नहीं हो जाती ,अपने बाप के घर चली जाओ।"
सरिता ने सपने में भी नहीं सोचा था कि ऐसा भी दिन आएगा। रमन ने उसे बच्चे को भी नहीं ले जाने दिया, यह सोच कर कि कहीं सरिता की बीमारी बच्चे को ना लग जाए ।
सरिता के मां बाप को लगा कि ठीक है सरिता का इलाज मायके में अच्छे से हो जाएगा ,लेकिन डॉक्टर ने बताया कि पूरा इलाज होने में करीब 8 महीने लग जाएंगे। सरिता का मन मायके में नहीं लगता। अपने बच्चे के बगैर कौन मा रह सकती है।
कुछ दिनों से पेट में तेज दर्द होने के कारण रमन डॉक्टर के पास गया ।डॉक्टर ने उसे कुछ टेस्ट कराने के लिए कहे ।रमन ने भी सारे टेस्ट तुरंत ही करवा लिए। लेकिन उसकी रिपोर्ट कुछ ऐसी आई कि रमन सकते में आ गया ।
रमन यह सपने में भी नहीं सोच सकता था की जिंदगी में कभी उसे यह बीमारी भी हो सकती है। डॉक्टर ने उसे बताया कि उसकी एक किडनी काम करना बंद कर चुकी है और उसे जल्द से जल्द किडनी बदलवानी पड़ेगी ।
मानो रमन की आंखों के आगे अंधेरा छा गया। घर वाले भी परेशान होने लगे ।अभी -अभी अभी तो रमन की पत्नी को बीमारी लगी और अभी रमन को इतनी बड़ी बीमारी।
लेकिन रमन ने अपनी बीमारी का ठीकरा भी अपनी पत्नी की मनहूसियत को दे डाला ।उसका मानना था उसकी पत्नी ही मनहूस है उसकी बीमारी की वजह से रमन को यह बड़ी बीमारी हो गई है। वह लाखों रुपए खर्च करने के लिए तैयार था लेकिन उसे तुरंत एक किडनी की जरूरत थी। डॉक्टर भी किडनी ढूंढने में लग चुके थे।
कुछ 3 महीनों में ही उसकी किडनी से मैच करती हुई किडनी उसे मिल गई ।डॉक्टर ने उसे एक कागज पर साइन करने के लिए कहा और पचास लाख रुपए किडनी देने वाले को कहा ।
रमन के पास पैसों की कोई कमी नहीं थी उसने 50 लाख का चेक और उस कागज को बिना देखे साइन करके डॉक्टर को दे दिया ।
2 महीनों के भीतर ही रमन पूरी तरह से ठीक हो गया। जब चेकअप करवाने डॉक्टर के पास आया तब डॉक्टर ने उसके हाथ में उसका चेक वापिस दिया ।रमन ने आश्चर्य से पूछा अरे यह तो किडनी देने वाले को देना था ।
आपने दिया नहीं ????
डॉक्टर ने कहा ...'नहीं।' लेकिन हां जिस कागज पर आप ने साइन किया था वह आपने शायद पढ़ा नहीं था।
रमन ने कहा कि ऐसा क्या लिखा था उस कागज में???
तब डॉक्टर ने उसे वह कागज थमाया ।
उस कागज पर लिखा था...' मैं सरिता आपको अपने शरीर का एक अंग दे रही हूं इसके बदले में मुझे कुछ नहीं चाहिए । "
नीचे रमन के हस्ताक्षर थे। डॉक्टर ने उसे कहा कि आज आप जो पूरी तरह से स्वस्थ है वह और किसी की वजह से नहीं बल्कि अपनी पत्नी की वजह से हैं। आपको जो किडनी मिली है वह आपकी पत्नी ने आपको दी है ।वह चाहती थी कि हम आपको ये ना बताए। लेकिन आज मै आपको यह बात बताना चाहता हू।
यह सुनते ही रमन की आंखों से पश्चाताप के आंसू बहने लगे ।उसकी आंखें उसकी पत्नी को ढूंढने लगी।तभी पीछे से उसकी पत्नी वहां आई। रमन उसके पैरों पर गिर पड़ा और उसने कहा ....'मैं कितना कठोर हूं। तुम्हारे शरीर पर हुए थोड़े से निशान देख कर मैंने तुम्हें अपने घर से निकाल दिया ।और तुमने मुझे अपने शरीर का अंग यूं ही निकाल कर दे दिया। कितनी महान हो तुम .....और मैं कितना छोटा इंसान हूं। मैं सचमुच तुम्हारा गुनहगार हूं। लेकिन मैं तुमसे वादा करता हूं कि मेरी जितनी भी जिंदगी बची है, मैं उसमें तुम्हें बहुत सारा प्यार और सम्मान दूंगा ।
इस कहानी का अंत में क्या करूं???
मैं खुद भी नहीं जानती ।
क्या सरिता को रमन को माफ कर देना चाहिए????
या सरिता को अपनी जिंदगी अपने हिसाब से जीनी चाहिए ???
सरिता ने क्या अपना पत्नी धर्म निभाया ?????
या सिर्फ इंसानियत के नाते उसने रमन की जिंदगी बचाई??? इस कहानी का अंत आप पाठकों के ऊपर है। आप जैसे चाहें इस कहानी का अंत लिख सकते हैं और मेरे साथ बांट सकते हैं।
कहानी को पढ़ने के लिए आप सबका बहुत-बहुत धन्यवाद।

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