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दिलो की दूरियां

खूबसूरत सी सोसायट  में अंजली और राहुल ने  एक घर खरीदा था।दोनों बहुत खुश थे।दोनों ही नए विचारों के थे। नौकरी की वजह से वे दोनों अपने परिवार से दूर रहते थे।


सारे रिश्तेदार यही सोचते कि अंजली और राहुल दोनों को घर वालो की पड़ी नहीं है।अपनी ही दुनिया में मस्त है।सास ससुर और ननद की कोई सुध नहीं लेते।

राहुल की बड़ी बहन  रमा दीदी विधवा थी।इसलिए वो अपने मायके में  मा -पिता के साथ रहती थीं।

अंजली चाहती थी कि वो नए घर में पूजा करवाए।इसलिए उसने अपने ससुराल वालों को बुला लिया।

सत्यनारायण की पूजा बहुत अच्छे से हो गई।नए घर में सारा सामान भी लग गया।अच्छा मुहूर्त देखकर रसोई में चूल्हा शुरू करना था।इस दिन सासु मा ना कहा कि सबसे पहले चूल्हे पे खीर या हलवा बनाना चाहिए।

अंजली ने हलवे के लिए सारा सामान रसोई घर में रख दिया ।

और रमा दीदी को आवाज़ देकर बुलाया।

अंजली बोली ' दीदी चलिए आप ही इस घर की रसोई में पहली बार गैस चालू कीजिए ।रमा दीदी आश्चर्य में पड़ गई ।

दीदी बोली अरे अंजली मै कैसे??????

तुम सुहागन हो ,तुम ही करो।तुम‍ इस घर  की अन्नपूर्णा हो। मै तो ........

अंजली बोली दीदी ये आप क्या कह रही है????मै आपका बहुत सम्मान करती हूं।और आपके हाथों से यदि इस घर में  चूल्हा शुरू होगा तो मुझे अच्छा लगेगा।

रमा दीदी की आंखे नम हो गई।

तभी राहुल आया उसने रमा दीदी के हाथो में एक कागज थामते हुए कहा 'दीदी नौकरी की वजह से आप सबसे अलग रहना पड़ता है मजबूरी है।लेकिन हम दोनों चाहते है। किआप अपना सपना पूरा करे ,इसलिए ये  आप के लिए।

रमा ने कागज खोल कर देखा तो वह देखते ही चौक गई।

राहुल ने रमा के नाम एक ज़मीन ली थी और उसमे एक प्लेस्कूल बनवा रहा था।

ये देख रमा और मा पिताजी सोच में पड़ गए कि हमारा बेटा हमसे दूर रहता है लेकिन हमारे दिलो से दूर नहीं हुआ।

 



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