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रात के खाने में क्या बनाऊं???? एक राष्ट्रीय समस्या


रात के खाने में क्या बनाया जाए??? इसे  एक राष्ट्रीय समस्या घोषित कर देना चाहिए।

 हर एक घर में शाम होते ही मम्मी की आवाज शुरू हो जाती है, आज खाने में क्या बनाऊं ???

फोन करके पति को पूछा जाता है ..आज खाने में क्या खाओगे???

 यह बात और है कि पत्नी बनाती वही है ,जो वह चाहती है ।लेकिन पूछना मानो उसका नियमित कर्म हो   ।वह सिर्फ यह सुनना चाहती है कि...कोई यह कह दे कि खिचड़ी बना लो ।

लेकिन मजाल है जो घर का कोई भी  सदस्य  यह कह दे कि..आज खिचड़ी बना लो।

 बच्चों से पूछा जाए तो बच्चे कहते...' मम्मी कुछ अच्छा बनाना आज'

  बहुत दिन हो गए ...बस कुछ अच्छा बना लो मम्मी आज ।

पतिदेव को पूछो तो  पतिदेव कहते हैं ...'जो बनाना हो बना लो.... सब चलेगा '(क्योंकि जनाब, पतिदेव पत्नी की आदत से अब पूरी तरह से वाकिफ हो चुके हैं)

 इस बात से पत्नी कभी संतुष्ट नहीं होती, दोबारा पूछती है ।कुछ भी का क्या मतलब होता है??? कुछ तो बताओ ।

रोज  यही पूछना पड़ता है। मैं भी परेशान हो जाती हूं। शाम के खाने में क्या बनाऊं यह सोचकर। कुछ तो बता दिया करो ।

पतिदेव कहते हैं...' ऐसा करो पनीर की सब्जी और पराठे सेक लो'

 पत्नी कहती है....' बाजू वाले की दुकान का पनीर तो बिल्कुल अच्छा नहीं आता ।गर्मियां चल रही है, पनीर खट्टा ही आता है।'

 पतिदेव कहते हैं ....'ठीक है तो आलू की सब्जी और परांठा बना लो।'

 पत्नी का जवाब .... आलू...???? आलू नुकसान करता है ।तुम्हें पता तो है वजन कितना बढ़ रहा है मेरा। आलू नहीं खा सकते हैं ।

दाल चावल  के विकल्प को भी पत्नी नकार देती है।

इसी तरह 4 ,5, 6 ,7 या फिर उससे भी ज्यादा ऑप्शन देने के बाद पति थक जाता है। और अपने हाथ ऊपर कर लेता है ।अपना पहला जवाब दोबारा कहता है ......"जो मन में आए वह बना लो सब चलेगा"

 पत्नी कहती है ....'ठीक है !छोड़ो  !तुम्हें फालतू में ही पूछा ।मैं ही देखती हूं ....क्या बनाना है ????

दूसरी तरफ बच्चे कुछ अच्छा बनाओ की रट लगाते हैं। और पतिदेव कुछ भी चलेगा कहते हैं ।

बीच में फंसती है मम्मी  ....

कभी  फ्रिज को खोल कर देखती है कि क्या है??? क्या बनाया जा सकता है ???कभी उसका आलस कुछ भी ना बनाने को कहता है ।

कभी पड़ोस से आ रही , अच्छी खुशबू  कुछ अच्छा बनाने के लिए प्रोत्साहित करती है। लेकिन उसका दिल नहीं करता ।

यदि पति बाहर चलने का सुझाव दें तो पत्नी कहती है....

' होटल का खाना बिलकुल स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं होता। एक बार जाओ और २००० रूपए खर्च हो जाते हैं ।इससे अच्छा घर में ही खाया जाए ।'

बच्चे फरमाइश करेंगे....'  मम्मी आज  पिज़्ज़ा ऑर्डर कर दे???डिस्काउंट चल रहा है।'

 मम्मी का जवाब ....'पेट खराब होता है ये पिज़्ज़ा खाने से। घर का खाना अच्छा नहीं लगता है ???घर का खाना खाया करो ।'

बात फिर से घूम फिर के आ जाती है कि........... "आखिर क्या बनाया जाए।"

वैसे बनता वही है जो मम्मी ने सुबह से ही सोच कर रखा होता  है।

 आप सभी के साथ ऐसा होता होगा आप भी अपने अनुभव  मेरे साथ शेयर करिए।




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