आर्यन 5 साल का हो चुका था। वह अपने आप को पूरी तरह से अपने मम्मी -पापा के हिसाब से एडजस्ट कर चुका था ।रोज सुबह होते ही दौड़- दौड़ कर मम्मी -पापा उसे तैयार करते और उसे स्कूल छोड़ देते।
स्कूल भी ऐसी चुनी थी, जो 8:00 बजे शुरू होती है और 3:00 बजे जाकर खत्म होती ।3:00 बजे स्कूल से छूटते ही आर्यन की मेड आ जाती और उसे डे केयर में छोड़ देती ।जो करीब राटके 8:00 बजे तक होता ।
आठ बजे तक वहां मम्मी या पापा आ जाते ,जो आर्यन को घर ले जाते।
सुबह के ८ से रात के ८ पूरे 12 घंटों में आर्यन ने क्या किया... यह बताने के लिए बस उसके पास 10 मिनट ही होते ,क्योंकि तब तक मम्मी -पापा थक चुके होते और आर्यन खुद भी थक के बस सो जाता ।
यही दिनचर्या थी उन सब की 12 घंटे मम्मी- पापा काम करते और 12 घंटे आर्यन किसी और की निगरानी में रहता।
बेशक आर्यन की मम्मी -पापा ने उसके लिए एक बहुत ही बेहतरीन स्कूल चुना था और डे- केयर भी ऐसा जो होटल से कम नहीं था। उसे कोई तकलीफ नहीं होती थी। लेकिन आर्यन अपना बचपन खोने लगा था।
गर्मी की छुट्टियां आ गई थी और स्कूल बंद हो गए थे। आर्यन के मम्मी पापा इसी दुविधा में थे कि सुबह 8:00 से 3:00 बजे तक आर्यन को कहां रखा जाए ???
न जाने कितने डे केयर, न जाने कितने समर क्लासेस में उन्होंने फोन करके पूछ लिया लेकिन कहीं कुछ हो नहीं पाया।
तब उन्होंने सोचा क्यों ना आर्यन की दादी को बुला लिया जाए। दादी भी खुशी-खुशी आ गई ।
आर्यन को देखकर वह इतनी खुश हूं कि उनकी आंख से आंसू आ गए ।आर्यन को दादी के साथ बहुत अच्छा लगने लगा ।सारा दिन वह दोनों खेलते ,कभी दादी उसे कहानी सुनाती तो, कभी उसकी पसंद का खाना बनाती।
गर्मी की छुट्टियां आर्यन की बहुत अच्छे से बीत रही थी।
एक दिन जब सभी शाम को एक साथ बैठे थे ,हंसी मजाक चल रहा था तो आर्यन की मम्मी ने उससे कहा .....'बड़े होकर तुम हमारा ध्यान तो रखोगे ना आर्यन????
आर्यन ने बड़ी मासूमियत से कहा ......'.हां .....मैं आप लोगों का एक ऐसी जगह एडमिशन करा दूंगा , जहां आप लोग 12 घंटों के लिए रह सके, क्योंकि उस समय तो मैं ऑफिस जाऊंगा। इसलिए मैं आपको वहां छोड़ दूंगा और जब ऑफिस से आऊंगा तो आपको ले आऊंगा। ठीक है ना ??????
(क्या आपके पास आर्यन की इस बात का कोई जवाब है??????क्या सचमुच पैसा या करियर इतना जरूरी हो गया कि उसके लिए हम अपने ही बच्चों का बचपन खो दे???)

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