उम्र करीब 60 साल ,5 फुट का कद,पतला सा शरीर, सफेद बालों को छुपाने के लिए लगाया हुआ काला रंग (जो माथे पर भी थोड़ा- थोड़ा लगा हुआ था।
पीले फूलों वाली साड़ी पहने सावित्री शायद दिलों के भाव चेहरे पर ना आए ऐसी कला जान चुकी थी । इकलौता बेटा विकास उससे दूर दूसरे शहर में रहता था लेकिन सावित्री ने कभी शिकायत नहीं की।
सावित्री ने अपने इकलौते बेटे को डॉक्टर बनया।
बेटे की शादी को ३ साल हो चुके थे।इन ३ सालों में वह अपनी ही दुनिया में मगन था। उसे अपना भविष्य बनाना था। मां से कभी- कभार फोन पर जरूर बात कर लिया करता था।
लेकिन मां की ममता हमेशा यही कहती ...मेरा बेटा कितना अच्छा है... मेरे बारे में कितनी फिक्र करता है ।सावित्री को कभी ऐसा लगा ही नहीं कि धीरे-धीरे इन ३ सालों में उसका बेटा दूर हो चला था ।क्योंकि सावित्री ने कभी उससे कुछ कहा ही नहीं ।उसे यह लगता ररहा कि बस उसका बेटा और बहू हमेशा खुश रहे ।
आज जब सावित्री का बेटा विदेश जाने की तैयारी कर रहा था, तब सावित्री से रहा ना गया । सावित्री कभी अपने बेटे से कुछ नहीं मांगती थी। कभी कोई शिकायत नहीं करती थी ।लेकिन 15 दिन के बाद ही विकास विदेश जाने वाला था ।
उसकी मां से रहा न गया ।फोन करके अपने बेटे से बोली 'विदेश जाने के पहले एक बार अपनी मां से मिलले।तू और बहू यहां आ जाओ ।सब से मिलना हो जाएगा। सब का आशीर्वाद भी मिल जाएगा तुम दोनों को।'
विकास बोला ...'अरे मां मुझसे तो नहीं हो पाएगा। तुम नहीं जानती कितने सारे कागज इकट्ठे करने पड़ते हैं ।विदेश जाना कोई आसान थोड़ी है ।तुम्हें क्या पता कितने दिनों से हम दोनों परेशान हैं ।दिन रात काम में लगे रहते हैं ।तुम्हारे पास समय हो तो तुम आ जाओ। लगे तो मैं तुम्हारी टिकट करा देता हूं ।'
आगे बो बोला ..."दो-चार दिन के लिए आ जाना ।हमारी पैकिंग में भी मदद हो जाएगी ।"
सावित्री फोन हाथ में लिए बस बैठे ही रह गई और विकास तो कब से फोन काट चुका था ।सावित्री सोचती रही मेरा बेटा मुझसे दूर जा रहा है। इस बात का दुख तो नहीं ,खुशी है कि वह तरक्की कर रहा है ।विदेश जाने से उसका भविष्य बन जाएगा ।
लेकिन क्या वो एक बार मुझसे मिलने नहीं आ सकता था ।
मा का हृदय था सब समझते हुए भी वह अपने बेटे को मिलने उसके घर चली गई।
देखा तो सारा घर अस्त-व्यस्त था। बहु का कहीं कोई पता नहीं था ।बेटे से पूछा तो बेटे ने कहा वह ऑफिस गई है ।रात को ही आएगी ।सावित्री ने सारा घर साफ किया। उनकी पैकिंग तक कर दी। उनके जाने के लिए जो भी तैयारी वह कर सकती थी, उसने कर दी।
देर रात बहू घर आई।
आते ही बोली.... "अरे !यह सब आपने क्यों कर लिया??? आप आई हैं आराम करें ,हम दोनों मिलकर यह सारा काम कर लेंगे ।आप चिंता मत करिए ।"
सावित्री ने कहा....' अरे कोई बात नहीं दिन भर बैठी थी इसलिए कर दिया। 'बहु तो दिनभर की थकी हुई थी, इसलिए जाकर सो गई ।विकास भी मां को यह कहकर कि सुबह जल्दी उठना है कमरे में चला गया ।
सावित्री एक दीवार पर लगी हुई बाल कृष्ण की तस्वीर को देखती रही ।उसे याद आया किस तरह उसने विकास के पैदा होने के लिए मन्नतें की थी। कितनी प्रार्थनाएं की थी।
सोचते -सोचते ही कब सुबह हो गई सावित्री को पता ही नहीं चला ।कुछ देर बाद जब विकास और उसकी पत्नी जागे तो देखा मां अपना सामान बांधे तैयार होकर बैठी थी।
विकास ने पूछा....' क्या बात है ????सुबह-सुबह तुम तैयार होकर यह सूटकेस बांधकर क्यों बैठी हो ???'
सावित्री ने कहा ....'विकास मैंने तुमसे कभी कोई उम्मीद नहीं की। कभी नहीं कहा कि तुम मेरे पास आकर रहो। कभी नहीं चाहा कि तुम मेरे बुढ़ापे का सहारा बनो।'
.......लेकिन तुम्हारे पास मेरे लिए दो मिनट का भी समय ना हो यह कभी नहीं सोचा था। अब जब तुम दोनों अपने लिए सब सोच सकते हो ,समझ सकते हो ,तुम दोनों को मेरी कोई जरूरत ही नहीं।
"शायद आशीर्वाद की भी नहीं......."
तो फिर मेरे यहां रहने का कोई अर्थ नहीं बनता ।
शायद मेरा यहां रहना तुम दोनों पर बोझ ही बनेगा। इसलिए बेहतर है कि मैं चली जाऊं।
मेरा आशीर्वाद हमेशा तुम दोनों के साथ रहेगा ।लेकिन याद रखना तुम भी अपने बुढ़ापे के लिए इंतजाम जरूर कर लेना ,क्योंकि तुम्हारी औलाद के पास शायद तुमसे भी कम समय होगा ।
चलती हूं ।
सदा सुखी रहो।......
( इस रचना को पढ़ने के लिए आप सबका धन्यवाद!आप सबको मेरी यह रचना कैसी लगी...कृपया मुझे बताइएगा।
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