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Showing posts from June, 2019

डिब्बे की अदला बदली से खुल गई पोल

ममता की शादी को अभी 6 महीने ही हुए थे । वह खुद को अपने ससुराल के रंग में रंगने की कोशिश कर रही थी ।इत्तेफाक से उसकी ननद का नाम भी ममता ही था ।हालांकि ममता दीदी उससे बड़ी थी और उनकी शादी हो चुकी थी। वह अपने ससुराल में बेहद खुश थी।  सावन का महीना शुरू होने ही वाला था।  ममता का यह पहला त्यौहार था इसलिए सांस ने सोचा क्यों ना बहू को साड़ी दे दी जाए।  सास और बहू दोनों ही साड़ी की दुकान पर पहुंच गई। सास ने बहू से कहा  ...'बहु तुम अपने लिए साड़ी पसंद कर लो, लेकिन ध्यान रखना ज्यादा महंगी मत लेना अभी शादी पर बहुत खर्चा हुआ है।'मैं तुम्हारी ममता दीदी के लिए भी एक सस्ती सी साड़ी देख लेती हूं तब तक।' बहू को लगा कि  सास सही कह रही है।उसने ₹१७00 की साड़ी पसंद कर ली ।तब तक सास ने भी ममता दीदी के लिए साड़ी पसंद कर ली और तुरंत ही दुकानदार को दोनों साड़ियों को डिब्बों में पैक करवाने के लिए भी कह दिया।सास ने तुरंत बिल भर दिया ।जिस पर ममता का कोई ध्यान नहीं था।  दोनों खुशी-खुशी घर लौट आए ।  बहु के हाथ से सासुमा ने  साड़ी का ए...

खुद को पहचानिए

आप सभी को मेरा प्यार भरा नमस्कार!  ना तो यह कहानी है, ना तो कोई लेख ।यह तो हमारी और आपकी मन की बातें हैं।  आपको ऐसा नहीं लगता कि हम सभी ज्यादातर शिकायतें करते हैं ???? दूसरों में कमियां निकालते हैं??? कभी सास की तो ,कभी ना नंद की ,कभी बहू की, तो कभी पति की ,कभी पड़ोसियों की ,तो कभी दोस्तों की ,कभी अपने  ऊपर होने वाले विश्वासघात की तो ,कभी खुद पर किए जाने वाले व्यंग की ,कभी मायके में सम्मान ना मिलने की, तो कभी भाई -बहनों के साथ अनबन की..... कितनी सारी शिकायत है हमें सबसे..  पर आपको नहीं लगता कि हम जिस से शिकायत कर रहे हैं उनमें से हम खुद भी एक हैं ??? यानी कि ऐसे भी लोग होंगे जिन्हें हम से शिकायत होगी । चलिए आज हम स्वयं का आकलन करते हैं । एक बेटी है ,एक बहू है, एक पत्नी है ,एक मां है, एक कामकाजी महिला हो, या एक घरेलू महिला ,एक पड़ोसी एक दोस्त, एक बहन, एक ननंद ,एक भाभी और बहुत सारे रिश्ते....  आपको क्या लगता है कौन सा रिश्ता आप 100% पूरी ईमानदारी से सचमुच निभा रही है????  कौन सा ऐसा काम है जिसे आप...

जिम्मेदारी उठाना सीखो

2 साल के अफेयर के बाद परिवार वालों की रजामंदी के साथ अंजली और रमन ने शादी कर ली। रमन के मम्मी और पापा गांव में रहते थे और अंजलि के मम्मी पापा मुंबई में ही रहते थे इसलिए अंजलि के लिए बहुत आसान था, जब भी कोई परेशानी होती, मम्मी को फोन कर लेती या मम्मी को बुला लिया करती। अंजली की मम्मी को भी लगता कि रमन और अंजली की नई नई शादी हुई है , उन्हें किसी बड़े की जरूरत पड़ती है।  लेकिन धीरे - धीरे अंजली के लिए यह सबसे आसान तरीका बन चुका था ।दिवाली की मिठाई बनाना हो या गर्मियों का अचार, घर में साफ सफाई करवाना हो या घर के किसी भी काम में जब उसे परेशानी होती, वह मम्मी की बुला लेती।  रमन को अंजली की इस बात से कोई परेशानी नहीं थी क्योंकि रमन दिनभर ऑफिस में रहता और पीछे से अंजलि सारे काम कर दिया करती तो फिर उसे कोई परेशानी कैसे हो सकती थी।  समय बीतने लगा और रमन और अंजली के घर एक छोटे से मेहमान के आने की खुशखबरी आईं ।अंजलि ने तो पहले ही तय किया था कि वह  पूरे समय अपनी मां के घर रहेगी या मां को अपने पास बुला लेगी ।अंजली की तबीयत ठीक नहीं थी इसलिए इस बा...

खुश रहने की चाबी...." संतोष "

महिमा और अजय  का प्रेम विवाह हुआ। दोनों ही सॉफ्टवेयर कंपनी में काम करते थे। दोनों ही अपनी शादी से बेहद खुश थे ।उन्हें अपनी कंपनी से ही विदेश जाने का मौका भी मिल गया ।वहां महिमा ने एक प्यारी सी बेटी को जन्म दिया। उन्होंने विदेश में रहकर नौकरी करके अच्छा खासा पैसा जमा कर लिया था और अब वे भारत लौटने की तैयारी कर रहे थे। महिमा और अजय अपने भविष्य को लेकर बहुत चिंतित रहा करते थे। दोनों को ही अपनी जिंदगी में बहुत बड़े-बड़े सपने पूरे करने थे। दोनों अपने सपनों को पूरा करने के लिए जी-जान से कोशिश करने लगे ।धीरे-धीरे इन सपने को पूरा करने की जिद में उनसे बहुत कुछ पीछे छूटता चला गया।  मम्मी- पापा, भाई -बहन ,रिश्तेदार , दोस्त बस नाम के लिए ही रह गये। महिमा और अजय 24 घंटे साथ रहा करते लेकिन उनकी निजी बातें एक मिनट भी नहीं होती ।सारा समय सिर्फ काम की ही बातें होती। अपनी बेटी को भी उन्होंने यही सिखाया कि उसे सिर्फ पढना है और  बड़ा हो के अपना नाम बनाना है ।बेटी भी उनके रंग में रंग गई। दिन भर किताबों में खोई रहती । उम्र के 50वे साल में महिमा और अजय प्रवेश कर रहे थ...

लड़के वालों ...ज़रा तो सोचो...

किरण की शादी को करीब 15 साल हो चुके थे। शादी करके जिस दिन से उसने ससुराल में कदम रखा, उस दिन से सासू माँ ने तो किचन से अपना नाता ही तोड़ दिया। घर के हर एक काम किरण ही करती। सुबह से लेकर शाम तक अपने ही कामों में व्यस्त रहा करती थी। किरण को धीरे-धीरे इसकी आदत हो गई कि ठीक है मुझे ही घर की जिम्मेदारी लेनी है। सास बता दिया करती कि खाना क्या बनेगा और किरण बना दिया करती। सास रसोई में पैर तक नहीं रखती थी, लेकिन नजर हमेशा रहती थी। किरण को यह बात अच्छी लगती थी कि उसकी सास कम से कम काम में दखल नहीं देती। ऑर्डर देकर चली जाती थी। किरण सब कर लेती थी, सब अपने हिसाब से करती। उसे याद है हर एक त्योहार पर उसके मायके से कुछ ना कुछ जरूर आता था। गर्मियों में आम की पेटी, राखी में शगुन, दीपावली पर मिठाईयां और खाना खाने का न्योता, जन्मदिन और सालगिरह पर उपहार सब कुछ किरण के ससुराल पहुंच ही जाता था। लेकिन कभी भी किरण के सास-ससुर ने यह नहीं सोचा कि कभी हम हमारे समधी को अपने घर बुलाएं, उन्हें खाने पर न्यौता दें या उनकी तबीयत पूछने के लिए फोन तक करें। किरण को यह बातें बहुत ही...