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लड़के वालों ...ज़रा तो सोचो...

किरण की शादी को करीब 15 साल हो चुके थे। शादी करके जिस दिन से उसने ससुराल में कदम रखा, उस दिन से सासू माँ ने तो किचन से अपना नाता ही तोड़ दिया। घर के हर एक काम किरण ही करती। सुबह से लेकर शाम तक अपने ही कामों में व्यस्त रहा करती थी।

किरण को धीरे-धीरे इसकी आदत हो गई कि ठीक है मुझे ही घर की जिम्मेदारी लेनी है। सास बता दिया करती कि खाना क्या बनेगा और किरण बना दिया करती। सास रसोई में पैर तक नहीं रखती थी, लेकिन नजर हमेशा रहती थी।

किरण को यह बात अच्छी लगती थी कि उसकी सास कम से कम काम में दखल नहीं देती। ऑर्डर देकर चली जाती थी। किरण सब कर लेती थी, सब अपने हिसाब से करती।

उसे याद है हर एक त्योहार पर उसके मायके से कुछ ना कुछ जरूर आता था। गर्मियों में आम की पेटी, राखी में शगुन, दीपावली पर मिठाईयां और खाना खाने का न्योता, जन्मदिन और सालगिरह पर उपहार सब कुछ किरण के ससुराल पहुंच ही जाता था। लेकिन कभी भी किरण के सास-ससुर ने यह नहीं सोचा कि कभी हम हमारे समधी को अपने घर बुलाएं, उन्हें खाने पर न्यौता दें या उनकी तबीयत पूछने के लिए फोन तक करें।

किरण को यह बातें बहुत ही बुरी लगती थी, यहां तक कि वह अपने माँ पिता को फोन तक नहीं कर पाती थी। मायका ससुराल दोनों पास में ही थे। बच्चे को स्कूल लेने-छोड़ते समय अपने मम्मी-पापा को कभी कभार मिल लिया करती थी। लेकिन उसका भी बड़ा मन होता था कि वह भी अपने मम्मी पापा को अपने घर बुलाए। जितने लज़ीज़ व्यंजन अपने ससुराल वालों को खिलाती थी, अपने माँ बाप के लिए बनाए। ससुराल में मेहमानों का ताता लगा रहता था, जिनकी खातिरदारी में किरण कभी पीछे नहीं रही। उसे लगता कभी तो मेरे माँ-बाप मेरे घर आएं, मैं उनकी खातिरदारी कर सकूं। लेकिन कभी सास ससुर के मन में यह ख्याल तक नहीं आया। किरण ने भी कभी कुछ कहा नहीं, सिर्फ अपने मन में ही यह बात रखी।

एक दिन किरण रात में अचानक सुबक-सुबक कर रोने लगी। पति की नींद खुली तो पति ने रोने का कारण पूछा। किरण पहले तो कुछ ना बोली फिर पति ने दोबारा पूछा तो उससे रहा नहीं गया| रोते रोते ही उसने अपने मन की बात उससे कह दी कि "मैं शादी करके आपके घर आई, आपके माता-पिता को, आपके रिश्तेदारों को अपना समझा, कभी कोई कमी नहीं की। क्या आप लोगों को कभी ख्याल नहीं आता कि मुझे भी लगता होगा कि, मैं मेरे माँ बाप की सेवा करूँ? उन्हें अपने इस घर में बुलाऊ? क्या आप लोगों को कभी ऐसा एहसास होता है कि एक लड़की इतने सालों अपने माँ बाप के घर रही, एक दिन उस घर को पराया कर अपने पति के घर आ जाती है, सारे रिश्ते निभाती है। क्या कभी नहीं लगता लड़के वालों को कि लड़की वालों को भी उनके घर बुलाएं? उनका सम्मान करें? लड़की वालों के घर से आए हुए तोहफे बड़े प्रेम से स्वीकार किये जाते हैं, कभी मन में नहीं आता कि इन तोहफों के बदले कुछ तो उन्हें दिया जाए?"


किरण के आंसू थे कि रुक ही नहीं रहे थे। किरण की यह सारी बातें उसके पति के दिल तक पहुंच चुकी थी। वह कुछ ना बोला। किरण को उसने कहा "तुम सो जाओ सब ठीक हो जाएगा|"

किरण को सुबह उठने में कुछ देर हो गई। जब उठी तब उसने देखा कि घर एकदम साफ सुथरा था। घर पर काम वाली आई थी जो रसोई घर में कुछ काम कर रही थी। सासू माँ उसे काम समझा रही थी। उसने जाकर अपने पति से पूछा कि "यह सब क्या हो रहा है?"

उसके पति ने कहा "मुझे माफ करना, 15 सालों में कभी मुझे ध्यान नहीं आया कि जैसे मैं चाहता हूं कि तुम मेरे माँ-बाप की सेवा करो, उन्हें नाश्ता, खाना, रात का दूध समय पर दो। मेहमानों की खातिरदारी करो। तुम्हारा भी मन करता होगा ना तुम्हारे माँ बाप को तुम यहां बुलाओ क्योंकि यह घर  तुम्हारा ही तो है। मैंने आज ही हमारे मम्मी-पापा को यहां बुलाया है और तुम्हारी मदद करने के लिए खाना बनाने वाली आंटी को भी बुलाया है| तुम अपने मम्मी-पापा की पसंद का खाना बनवाओ। मैं कुछ तोहफे लेकर आता हूं। काश किरण तुमने मुझे अपने दिल की बात पहले बता दी होती तो..... खैर, अब जब तुमने मुझे बताया है तो मुझे भी समझ आया है। मैं कोशिश करूंगा जिस तरह तुम अपने सास-ससुर का ध्यान रखती हो, मैं भी अपने सास-ससुर का ध्यान रखूं।"

किरण की खुशी का कोई ठिकाना ही नहीं था। उसे लगा जैसे कि 15 सालों से उसके दिल में जो ख्वाहिश थी वह पूरी हो गई हो। आज पहली बार किरण के मम्मी-पापा उसके घर पूरे सम्मान के साथ आएंगे।

(इस रचना को अपना समय देने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद! इस रचना के माध्यम से सिर्फ इतना कहना चाहती हूं कि समय आ गया है सोच बदलने का। लड़के वाले, लड़की वालों के बीच का भेदभाव को दूर करने का|)



Comments

  1. Beautiful writing Payal.. Congrats and keep it up 👍

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