Skip to main content

सफेद घोड़े पर सवार मेरा राजकुमार आएगा

कविता दौड़ -दौड़ कर अपने हाथों में रखी हुई ,अखबार की पर्चियां सबको दे रही थी और सब से कह रही थी...' यह मेरी शादी का निमंत्रण पत्र है, आप सब आइएगा।


 'कभी शरमा जाती ,तो कभी घबरा जाती ,कभी किसी से कहती ....' तुम्हें मालूम  है मेरा  शादी का लहंगा  सुर्ख लाल  है, बहुत सुंदर है, सितारे जड़े हुए हैं ,चांदी के तार से पूरा काम करवाया है मेरी मां ने।'


 तो कभी किसी को कहती ....'सुन मेरी शादी में समय पर आ जाना ।फेरे जरूर देखना। तुझे मालूम है सात फेरे कितने महत्वपूर्ण होते हैं। मै तो मेरे उनके साथ सात कस्मे खाऊंगी और जीवनभर उनका साथ निभाऊंगी।' 
कविता मानसिक रोगियों के अस्पताल में अपना इलाज करवाने के लिए पिछले 15 दिनों से यहां पर थी ।अस्पताल के सभी कर्मचारी उसे अच्छी तरह जानते थे ।सभी जानते थे कि कविता को सिर्फ एक ही बात का इंतजार है और वह है उसकी शादी ।सोते जागते ...यहां तक कि सपनों में भी यही कहती ....मेरा राजकुमार आ गया... मेरा दूल्हा आ गया... शहनाई बजाओ....


अभी कविता सबको अखबार की पर्चियों को  निमंत्रण पत्र समझकर दे रही थी, कि तभी सामने से उसे अपने मा - पिताजी दिखाई दिए ।


कविता अपने माता - पिता को अच्छी तरह पहचान जाती थी। 70 वर्ष के बूढ़े मां बाप अपने 40 वर्ष की बेटी को इस तरह  नहीं  देख पाते । उनके आंसू  भी अब तक सूख चुके थे ।कविता का ठीक होना लगभग नामुमकिन था ।हर दो या तीन महीनों में ही उसे मानसिक दौरा पड़ता और उसे इस तरह से अस्पताल में लाना पड़ता ।


मां को देख कविता शरमाते हुए बोली.....' मा आपके दामाद  कैसे हैं ????वह वह साथ नहीं आए क्या??? उनसे कहो ना मैं उनका इंतजार करती हूं। फिर अचानक खुद ही कहने लगी... अरे!!!! मैंने ही तो उनसे कहा था, शादी के पहले हम आपस में नहीं मिलेंगे। मैं भी कितनी पागल हूं ।मां मैं जाती हूं...  सहेलियों को शादी के कार्ड भी तो देना है ना ।बहुत सारे काम है ।तुम भी सारे काम निपटा लो। यह कहकर कविता वहां से चली गई।


कविता की मां और पिताजी एक दूसरे को देखते रहे ना कोई सवाल ना कोई जवाब। सिर्फ  इस बात का दुख था कि जिंदगी के आखरी सालों में उन्हें यह दिन देखना पड़ रहा है ।वह तुरंत ही कविता के डॉक्टर के पास  पहुंच गए ।डॉक्टर ने उन्हें बताया कि कविता पहले से ठीक है ।उसका जो आक्रामक व्यवहार था ,उसमें काफी परिवर्तन आया है। लेकिन उसके ठीक होने की गुंजाइश ना के बराबर है... क्योंकि उसका यह रोग आज का नहीं कई साल पुराना है ।पिछले कई सालों से हर दो-तीन महीनों में उसे अस्पताल लाया जाता इलेक्ट्रिक शॉक दिया जाता ।बहुत कोशिश करने के बाद भी कविता ठीक नहीं हो पा रही थी। ऐसा लगता है जैसे उसके किसी प्रेमी ने उसे धोखा दिया और उसका गम उसके दिमाग पे ऐसा असर कर गया  की उसकी हालत इस तरह की हो गई।


अस्पताल में कविता को रखने का खर्च बहुत ज्यादा था अभी तो पिताजी ने दो लाख रुपए अस्पताल में जमा करा दिए। और कितने पैसे उन्हें देने पड़ेंगे, उन्हें भी नहीं मालूम था।


कविता के माता-पिता उसे  मिले बगैर ही घर की ओर रवाना हो गए। घर और अस्पताल की दूरी दो घंटों की थी। दो घंटे बस में बैठे-बैठे  दोनों एक ही बात सोच रहे थे ।लेकिन किसी ने भी एक शब्द नहीं कहा। कविता की मां सोच रही थी.... 10 साल पहले कविता जब 30 साल की थी तब कविता के लिए कितना अच्छा रिश्ता आया था।  कविता के घर वालों ने उसकी शादी  की कितनी अच्छी तैयारियां की थी। क्योंकि सभी जानते थी  कि कविता  की बड़ी बहन की शादी होने के बाद उसकी शादी में थोड़ी देर हो गई थी। जहां वह 24 साल में शादी करना चाहती थी अब 3० की हो चली थी।


 लेकिन फिर भी अच्छा रिश्ता देर से ही सही मिल तो गया ।
बारात दरवाजे पर थी कविता लाल लहंगा पहने थी। चांदी के तारों का उस पर काम था, सितारे जड़े हुए थे ।बहुत प्यारी सी लग रही थी ।बारात का स्वागत किया गया। दूल्हा भी मंडप तक पहुंच गया था।


 कविता की सारी सहेलियां, सारे दोस्त शादी में शरीक हो चुके थे ।सभी कविता के लिए बहुत खुश थे। उसकी सारी सहेलियों की शादी हो चुकी थी ।सिर्फ कविता की ही शादी बाकी थी।


कविता को शादी की रस्मों को पूरा करने के लिए मंडप में बुलाया गया ।तभी  दूल्हे ने कविता  को देखा तो उसने अचानक सबके सामने कविता से शादी के लिए मना कर दिया ।सभी ने उसे बहुत समझाया कि सब कुछ अच्छा है। उसे उससे शादी कर लेनी चाहिए। लेकिन लड़के ने  ना  मानी। 


लड़के वाले बारात वापस ले गए ।समाज में  कविता के परिवार  की बहुत बदनामी हुई ।लोगों ने बहुत सी बातें की  कुछ ने कहा कि..... दहेज नहीं दिया इसलिए शादी टूट गई ।


किसी ने कहा कि... कविता किसी और से प्यार करती होगी इसलिए  इस लड़के ने शादी नहीं की। और ना जाने क्या-क्या अटकलें लगाने लगे लोग।


दो-चार दिन ही हुए थे कि कविता अकेले -अकेले रहने लगी। खुद को कमरे में बंद कर दिया। ना खाना खाती ,ना  किसी से बात करती। यहां तक कि अपनी नौकरी तक छोड़ दी। घर वालों को थोड़ी चिंता होने लगी थी  ,लेकिन उन्होंने सोचा समय रहते सब सब ठीक हो जाएगा ।
समय बीतने लगा कविता के मम्मी-पापा ने उसकी शादी के लिए रिश्ते देखना फिर से शुरू किया। लेकिन कविता हर बार मना कर देती। उसे हर लड़के में कोई ना कोई दोष नजर आता ।कभी उसे लड़का सुंदर नहीं लगता, तो कभी उसकी कमाई कम लगती ,तो कभी परिवार अच्छा नहीं लगता। ऐसा लगता था मानो उसे अब भी उसी लड़के का इंतजार हो।
कविता धीरे-धीरे गुमसुम ,उदास ,परेशान ,उदासीन और निराश रहने लगी।  अकेलापन इतना ज्यादा बढ़ गया कि अब उसके दिमाग पर असर होने लगा था। लेकिन उस समय मानसिक रोग जैसी कोई बीमारी भी होती है, इसकी खबर उसके माता-पिता को नहीं थी। वह तो कविता का यह व्यवहार केवल उसका  दुख समझ रहे थे। एक साल बीत गया कविता पूरी तरह से डिप्रेशन का शिकार हो चली थी। जिसकी खबर उसके घर वालों को ना चली।उन्होंने किसी मानसिक रोग विशेषज्ञ को नहीं दिखाया।


इस बीच उन्होंने अपने बेटे चिराग की शादी कर दी ।चिराग अपनी गृहस्थी में व्यस्त हो गया और कविता की बड़ी बहन अपनी शादीशुदा जिंदगी में ।


कविता की हालत धीरे -धीरे और खराब होने लगी। उसके व्यवहार में बहुत परिवर्तन होने लगा ।अचानक उसे गुस्सा आ जाता ।चीजें फेकने लगती। कभी किसी को घूरती  ही रहती।कभी कभी तो किसी को मार भी देती।


कविता की इस हालत को देखते हुए उसका भाई और उसके पिताजी उसे अस्पताल ले गए ।डॉक्टर ने कई दवाइयां दी ।इंजेक्शन दिए और उसे खुश रहने के लिए कहा। कुछ समय के लिए तो कविता की हालत सुधरी ।लेकिन जब भी किसी शादीशुदा लड़की को देखती, उसे फिर से याद आने लगता  कि वह जिसे चाहती थी वह उसे जिंदगी में नहीं मिला और फिर से उसका वही असामान्य  व्यवहार शुरू हो जाता है।


 कविता के माता - पिता ने  उसका कई डॉक्टरों  से इलाज करवाया ,लेकिन असफलता ही हाथ आई और रिटायरमेंट के लिए जमा किए पैसे भी खत्म होने लगे थे। यूं कहें कि अब बस उनके पास कोई चारा नहीं था। लाचार माता - पिता  कुछ नहीं कर पा रहे थे।


दो घंटों के सफर मे पुरानी बातें दोनों के दिल और दिमाग पर छाई रही और दूसरी तरफ अस्पताल में कविता डॉक्टर से कहने लगी ....'आपको मालूम है ...,सफेद घोड़े पर सवार मेरा दूल्हा आएगा  और मुझे साथ ले जाएगा।'


(आखिर क्या दोष था कविता का????? कौन था उसकी हालत का ज़िम्मेदार?????)




Comments

Popular posts from this blog

अब नहीं होंगे गर्मी की छुट्टियों में बच्चे बोर

 गर्मी की छुट्टियों का इंतजार बच्चों को बेसब्री से होता है ।पूरे साल में यही वे दिन होते हैं जब वे बिना किसी टाइम टेबल के समय बिताते हैं । लेकिन गर्मी की छुट्टियां आते ही ,बच्चों के मम्मी और पापा परेशान से हो जाते हैं। उनकी सबसे बड़ी यही परेशानी होती है ,कि  बच्चों को पूरा दिन कैसे व्यस्त रखा जाए??? क्योंकि  बच्चे ज्यादातर समय अपना इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स जैसे कि मोबाइल ,लैपटॉप ,टीवी आदि में दे देते हैं । तो चलिए आप सभी के लिए मैं कुछ सुझाव लाई हूं ,आशा करती हूं कि यह सुझाव आपके बच्चों के जरूर काम आएगा। गर्मी की छुट्टियों में बच्चों को किसी  टाइम टेबल  के तहत ना बांधे । गर्मी की छुट्टियों में बच्चों के लिए  आपका साथ  सबसे ज्यादा जरूरी होता है। बच्चों को प्रकृति से मिलाएं आपके आसपास यदि कोई  नर्सरी  है तो आप बच्चों को वहां ले जा सकते हैं ।जहां वे नए -नए पौधों के बारे में, इनडोर -आउटडोर प्लांट्स के बारे में जानकारी पा सकते हैं ।उनके मनपसंद  पौधों को घर लेकर आए और उसमें पानी डालने की जिम्मेदारी बच्चे क...

रात के खाने में क्या बनाऊं???? एक राष्ट्रीय समस्या

रात के खाने में क्या बनाया जाए??? इसे  एक राष्ट्रीय समस्या घोषित कर देना चाहिए।  हर एक घर में शाम होते ही मम्मी की आवाज शुरू हो जाती है, आज खाने में क्या बनाऊं ??? फोन करके पति को पूछा जाता है ..आज खाने में क्या खाओगे???  यह बात और है कि पत्नी बनाती वही है ,जो वह चाहती है ।लेकिन पूछना मानो उसका नियमित कर्म हो   ।वह सिर्फ यह सुनना चाहती है कि...कोई यह कह दे कि खिचड़ी बना लो । लेकिन मजाल है जो घर का कोई भी  सदस्य  यह कह दे कि..आज खिचड़ी बना लो।  बच्चों से पूछा जाए तो बच्चे कहते...' मम्मी कुछ  अच्छा बनाना आज'   बहुत दिन हो गए ...बस कुछ अच्छा बना लो मम्मी आज । पतिदेव को पूछो तो  पतिदेव कहते हैं ...' जो बनाना हो बना लो.... सब चलेगा '(क्योंकि जनाब, पतिदेव पत्नी की आदत से अब पूरी तरह से वाकिफ हो चुके हैं)  इस बात से पत्नी कभी संतुष्ट नहीं होती, दोबारा पूछती है । कुछ भी का क्या मतलब होता है??? कुछ तो बताओ  । रोज  यही पूछना पड़ता है। मैं भी परेशान ह...

डिब्बे की अदला बदली से खुल गई पोल

ममता की शादी को अभी 6 महीने ही हुए थे । वह खुद को अपने ससुराल के रंग में रंगने की कोशिश कर रही थी ।इत्तेफाक से उसकी ननद का नाम भी ममता ही था ।हालांकि ममता दीदी उससे बड़ी थी और उनकी शादी हो चुकी थी। वह अपने ससुराल में बेहद खुश थी।  सावन का महीना शुरू होने ही वाला था।  ममता का यह पहला त्यौहार था इसलिए सांस ने सोचा क्यों ना बहू को साड़ी दे दी जाए।  सास और बहू दोनों ही साड़ी की दुकान पर पहुंच गई। सास ने बहू से कहा  ...'बहु तुम अपने लिए साड़ी पसंद कर लो, लेकिन ध्यान रखना ज्यादा महंगी मत लेना अभी शादी पर बहुत खर्चा हुआ है।'मैं तुम्हारी ममता दीदी के लिए भी एक सस्ती सी साड़ी देख लेती हूं तब तक।' बहू को लगा कि  सास सही कह रही है।उसने ₹१७00 की साड़ी पसंद कर ली ।तब तक सास ने भी ममता दीदी के लिए साड़ी पसंद कर ली और तुरंत ही दुकानदार को दोनों साड़ियों को डिब्बों में पैक करवाने के लिए भी कह दिया।सास ने तुरंत बिल भर दिया ।जिस पर ममता का कोई ध्यान नहीं था।  दोनों खुशी-खुशी घर लौट आए ।  बहु के हाथ से सासुमा ने  साड़ी का ए...