शाम को मंजुजी घर के पास के बगीचे में टहल रही थी।मंजू जी की उम्र करीब ६२ साल की थी । तभी उनके सहेली उमाजी वहां पर आ गई ।आज उमा जी अकेले नहीं थी, उनके साथ उनकी एक और सहेली थी। जो करीब आयु में 55 साल की थी।
उमा ने मंजू जी से अपनी सहेली का परिचय कराते हुए कहा ...'मंजू जी यह है मेरी सहेली सुमित्रा..अभी-अभी इस सोसाइटी में आई है ।उनके बेटे ने यहां पर घर खरीदा है ।तो वह यहां शिफ्ट हुए हैं ।मैंने सोचा आप से इनकी मुलाकात करा दू, परिचय हो जाएगा ,तो फिर यह भी हम सब के साथ घुल मिल जाएंगी।
मंजू सुमित्रा और उमा तीनों सैर करने लगे ।सुमित्रा जी ने बातों बातों में अपने घर की कहानी मंजू जी को बताना शुरू कर दिया ।वे कहने लगी कि ...'मै इस सोसाइटी में तो अभी हूं ....पर पता नहीं 3 महीनों के बाद यहां रहूंगी या नहीं ???
मंजू जी ने जो कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि पिछले साल ही उनके पति का निधन हो गया और अब पिछले 10 महीनों से वे कभी बड़े बेटे या कभी छोटे बेटे के बीच ही झूल रही हैं ।
3 महीने होते नहीं कि बड़ा बेटा कहता है छोटे के घर चली जाओ ।वहां रुकते अभी कुछ टाइम हुआ नहीं कि छोटा कहता है अब बड़े के घर को चली जाओ।
पति थे तब ठीक था लेकिन अब तो बस एक घर से दूसरे घर घूमना पड़ रहा है ।ऐसा लग रहा है कि जिंदगी खत्म होने के पहले ही मर रही हूं मै।कहते कहते उनकी आंखे नम हो गई।
उनसे मंजू जी कुछ नहीं बोली, उन्हें ऐसे लगा कि यह उनकी पहली मुलाकात है , वे सुमित्रा को जानती तक नहीं फिर उनके घरेलू मामले में क्या कहती ।
मंजू जी ने तो जवाब नहीं दिया लेकिन उमा बहन बोली....' हां सुमित्रा यही होता है। मेरा तो एक ही बेटा है, इसलिए उसके पास दूसरा कोई चारा नहीं लेकिन मैंने यह बात साफ-साफ कह रखी है कि जिस दिन ऐसा लगे कि मां से तकलीफ हो रही है, उस दिन तुम अपनी पत्नी को लेकर घर से चले जाना ।क्योंकि यह घर मेरा है।'
सुमित्रा कहने लगी..' चलिए आपका तो यह अच्छा है... घर तो है आपका।' हमने तो कभी ऐसा सोचा ही नहीं था कि एक छत के लिए भी तरस जाएंगे। सोचा था जो कुछ भी है सब अपना ही है यह नहीं मालूम था कि अपने लिए अलग और बच्चों के लिए अलग रखना चाहिए ।
उनकी उदासी धीरे-धीरे बढ़ने लगी थी मंजू जी की तरफ से कोई भी प्रतिक्रिया नहीं आई। तब उन्होंने पूछा ....'क्या बात है ???आप कुछ बोल नहीं रही ???
तो मंजू जी ने कहा....' आप लोग जो बातें कर रहे हैं उसमें मेरा कोई अनुभव नहीं फिर मैं क्या कहूं???'
'मेरी दो बेटियां हैं दोनों की शादी हो चुकी है। बेटा है नहीं तो बेटे और बहू का कोई अनुभव नहीं। यह जो घर है वह हमारा अपना है ।घर पर अधिकार जमाने के लिए भी कोई नहीं। तो ऐसी समस्या हमें नहीं होती।'
सुमित्रा जी बोली...' चलिए बहुत खुशनसीब है आप, कि आपका कोई बेटा नहीं वरना तो बेटे की शादी के बाद बहू आती है...फिर बहू के ताने और फिर अपने ही घर का बटवारा और कभी-कभी तो अपने लिए छत के लिए भी तरस जाते हैं ।'
'आप बहुत ही खुशनसीब हैं। बेटे बहू ही नहीं तो कोई उम्मीद ही नहीं, आशा ही नहीं तो फिर उम्मीदें टूटने का डर भी नहीं आपको।
'मंजू जी आपको बता नहीं सकती जब अपने ही बेटे आप को कह दे कि तुम थोड़े दिन वहां चली जाओ तो कितना दर्द होता है कितना बुरा लगता है शुक्र है यह दर्द आपको नहीं सहना पड़ता।'
मंजू जी नेव सर हिलाया लेकिन कुछ ना बोली और तीनों चुपचाप ट ह ल ने लगे ।तीनों जानते थे कि परिस्थितियों को बदलना अब मुश्किल है। लेकिन हां यदि समय रहते उन्होंने अपने खुद के लिए के भविष्य के लिए सोचा होता और अपने लिए एक छत रखी होती तो बेहतर होता।
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