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रविवार की शाम का मज़ा

सोमवार से शुक्रवार थका देने वाले 5 दिन  और उसके बाद आता है ढेर सारी खुशियां देने वाला प्यारा सा वीकेंड।

चलिए तो इस लेख के माध्यम से हम सभी आज का दिन रविवार मान लेते हैं और करते हैं मॉल की सैर और देखते हैं क्या क्या होता है?????

चलिए शाम के  ६:00 बज गए हैं। घर के सभी सदस्यों ने बढ़िया से कपड़े पहन लिए हैं ।पत्नी जी ने अपना स्टेटस भी अपडेट कर दिया है 'गोइंग टू मॉल '।

बच्चों ने पूरी तरह से तय कर लिया है कि मॉल में जाकर उन्हें क्या- क्या खाना है। बस मम्मी की शॉपिंग आज ना हो, इसी बात की प्रार्थना कर रहे है । और पतिदेव बस यही चाहते हैं जल्दी से जल्दी हम घर वापस आ जाए। बच्चे और पत्नी खुश हो जाए ।

चलिए तो चले ....
 मॉल, हम जो आधे घंटे में पहुंच सकते थे ,आज ५५ मिनट लग गए।  रविवार को सड़कों पर ट्रैफिक ही इतना हो जाता है मानो लोगों को यही समय और यही दिन मिलता है बाहर जाने के लिए, जब हमें जाना होता है ।

चलिए जनाब हाथों की और पैरों की कसरत तो हो गई गाड़ी चला कर ।अब करते हैं दूसरी  कसरत ,गाड़ी को पार्किंग में पार्क करने की। यह काम बहुत ही जटिल है। इसे कोई भी साधारण सा काम ना समझे ।आगे - पीछे, ऊपर -नीचे  नजरें पूरी चौकन्नी और किसी भी तरह से गाड़ी को सही जगह पर पार्क करना एक जंग जीतने के बराबर ही होता है ।

 कार से उतरते ही बच्चों ने छलांग लगा दी फूड कोर्ट की तरफ ।पत्नी ने मुंह बनाया...,क्योंकि मैडम को  करनी  थी शॉपिंग ।

मैं बेचारा फस गया कहां जाऊं ????

मरता  क्या ना करता ...

बच्चों को समझाया चलो थोड़ी देर बेटा मम्मी के साथ बिताए। दोनों को एक  फोन थमाया थोड़ी देर शांत होकर बैठने को  कहा।

पत्नी की शॉपिंग कभी ना ख़तम होने वाली दिखाई दे रही थी।मै उनके पीछे- पीछे था । उन्हें कुछ ना  पसंद आया ,लेकिन ना जाने कैसे २ घंटे बीत गए।मैंने पूछा क्या हुआ कुछ लिया नहीं???

बड़े गुस्से से बोली 'ऊफ इतनी जल्दी- जल्दी शॉपिंग में कोई मज़ा नहीं आता। नेक्स्ट टाइम इत्मीनान से आयेगे।'

मै भोचक्का रह गया ।२ घंटो में १५ ड्रेस ट्राय किए,हम  ८ आउटलेट जाके आए और मैडम कहती है कि इत्मीनान से आयेंगे!!!!!

खैर बच्चों के पेट में जो चूहे थे अब हाथी बन चुके थे।

हम सब भागे फूड कोर्ट की तरफ।चारो तरफ नजर घुमाई तो पाया एक भी टेबल खाली नहीं था।

बेटा मेरा समझदार बोला सब अलग अलग डायरेक्शन में चले जाओ जहा टेबल खाली हो, धावा बोल दो।

मेरी तरफ से उसे ग्रीन सिग्नल मिल गया ।

अफरातफरी मच गई।हमारी नजर लोगो की डिशेज पे टिक गई।किसका कितना खाना बाकी है ?ऐसा नहीं था कि टेबल की खोज में हम ही  थे, कई लोग उनपर नजर गड़ाए थे।

बेटी ने आखिरकार एक टेबल हथिया लिया।हम सब ने राहत की सांस ली।चिल्लाकर मैडम को भी बुलाया।

मैडम  बोली चलो ऑर्डर करो, जो खाना हो......

हमारी इतनी मेहनत के लिए उनसे एक तारीफ के बोल तक ना  बोले गए।

चलो कोई नहीं......

खाना ऑर्डर करना भी  दूसरी जंग का हिस्सा बन गया । सब ने तय कर लिया था कि क्या खाना है ,लेकिन ऑर्डर देने के लिए लंबी लाइन लगी हुई थी ।ऑर्डर लेने वालों को कोई दिलचस्पी नहीं थी हम में। करीब आधा घंटा हमें लगा ऑर्डर देने में ।

 फिर इंतजार ...लंबा इंतज़ार...... खाना  आने के लिए ।खाना आता तब तक मन ही मन सब यही सोच रहे थे इससे अच्छा घर पर ही ऑर्डर कर लेते। पर कोई मुंह से कुछ नहीं बोला।

 खाना आया ,सबने मजे से खाया ।पत्नी जी ने बिल की तरफ अपनी नजरें गड़ाइ ,मेरी तरफ  थोड़ा घूर के भी देखी, कि इतना सा खाना और इतना बड़ा बिल???

 इतने में तो ८ दिन खाना बन जाता  घर पर ।

बात इशारों में थी, आंखों आंखों में थी ।वह बोल गइ, पर मैंने जवाब नहीं दिया।

 रात के ११ बज चुके थे। हम सब घर पहुंच गए ।मैंने राहत की सांस ली। सब कुछ ठीक से हो गया ,लेकिन पत्नी जी का हमेशा वाला एक डायलॉग अभी सुनना बाकी था ।अगली बार खाना तो घर पर ही मंगा लेंगे ।आराम से शॉपिंग करने जाएंगे। ऐसे में कुछ मजा तो आता नहीं है ।

बस डायलॉग खत्म और मेरी नींद शुरू ।

(  चलिए आप भी बताइए आपका Sunday यदि आप मॉल के फूड कोर्ट में मनाएंगे तो कैसा होगा वो???)


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