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विरासत में ...संस्कार दे अपने बच्चों को

 हेलो ...हाउ आर यू???

 हाय !!!हाउ आर यू बेटा ???

मनीषा टीचर ने अपने ही स्कूल में पढ़ने वाली एक छात्रा को
जब अपनी सोसाइटी में देखा तो करीब दो-तीन बार यही सवाल पूछा, किंतु बदले में छात्रा जिया ने कुछ भी नहीं कहा बल्कि वहां से चली गई। जिया की मां ने कहा ...' टीचर उसका मूड नहीं है।'

 घर आकर मनीषा ने जब यह बात दोबारा सोची तब उसे लगा कि आखिर उस बच्ची ने उसके सवाल का जवाब तक नहीं दिया और उसे याद आया कि जब वह छोटी थी तब किस तरह से  शिक्षिकाओं को मिलकर उन्हें नमस्ते करती। उनका अभिवादन करती ।

लेकिन क्या आजकल के बच्चों को बड़ों के लिए कोई सम्मान नहीं???

ऐसा मनीषा के साथ ही नहीं हमारे साथ भी होता है ।कई बार हम हमारे दोस्तों ,रिश्तेदारों के घर जाते हैं ,लेकिन उनके बच्चे हमें देखकर ना तो हमें नमस्ते करते हैं, ना ही हमारे किसी सवाल का जवाब  देते हैं, बस अपने कमरे में चले जाते हैं।(हमारे स्वयं के बच्चे भी ऐसा ही व्यवहार करते हैं)

सुबह शाम की पूजा या आरती में शामिल होना उन्हें अच्छा नहीं लगता। घर में किसी बड़े - बुजुर्ग की तबीयत खराब हो जाए ,तो अस्पताल में उन्हें देखने जाना उन्हें पसंद नहीं आता ।यदि हम उन्हें यह कहते कि किसी बड़े को उनके घर तक छोड़ आओ, तो वे सीधे सीधे मना कर देते हैं ।सबके साथ खाना खाना ,अपनी चीजो को दूसरे के साथ बांटना उन्हें पसंद नहीं।
अपने बड़ों के पैर छूकर आशीर्वाद लेना तो जैसे बच्चों को कभी सिखाया ही नहीं गया। इसका पूरा -  पूरा दोष हम अभिभावकों को ही जाता है।

हम बचपन से ही उन्हें उनकी सुविधा की हर एक चीज उन्हें लाकर देते हैं ।अपनी हैसियत के हिसाब से अच्छी से अच्छी स्कूल में पढ़ाने की कोशिश करते हैं ।उनके भविष्य को सुरक्षित करने के लिए बहुत मेहनत करते हैं ।लेकिन हम सबसे महत्वपूर्ण कार्य तो भूल ही जाते हैं जो हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है.....  उन्हें संस्कार देने की।

मुझे ऐसा लगता है कि बच्चे बड़े होकर जिम्मेदार नागरिक तो जरूर बनेंगे और अपना भविष्य स्वयं सुरक्षित करने की काबिलियत भी हासिल कर लेंगे। लेकिन उनके पास जो नहीं होगा वह  होगी हमारी भारतीय संस्कृति ,हमारी परंपराएं ,हमारे   संस्कार ।

परिस्थितियां शायद ऐसी भी आ चुकी है जब भारत में रहने वाले लोग ,अपने ही बच्चों को यह सिखा रहे हैं कि उन्हें बड़े होकर तो विदेश में ही रहना है ।बच्चे भी यही सीख रहे हैं कि भारत में कुछ नहीं है, बड़े होकर विदेश जाना है और वही अपना जीवन बिताना है ।


आखिर क्यों हम हमारी संस्कृति,हमारे संस्कारों को अपनी अगली पीढ़ी तक नहीं पहुंचा रहे??? क्यों हमारे बच्चों को हमारे महान ग्रंथों के बारे में ,हमारे वेदों के बारे में ,पुराणों के बारे में नहीं बताते ?

विश्व की सभी सभ्यताओं में भारतीय सभ्यता का एक विशेष स्थान है तो फिर क्यों भारतीय नागरिक अपने ही सभ्यता ,अपने ही संस्कारों पर गौरवान्वित नहीं है???

क्यों हम हमारे महान ग्रंथो महाभारत ,रामायण ,गीता में से कुछ अच्छी बातें हमारे  बच्चों को नहीं सिखाते??? क्यों हमने हमारे बच्चों को अभी तक चाणक्य ,विवेकानंद ,आर्यभट्ट  ,सूरदास ,तुलसीदास,प्रेमचंद और कई गुणवान व्यक्तियों के बारे में नहीं बताया ????
चलिए आज से हम हमारे बच्चों को हमारे भारतीय संस्कारों की छोटी-छोटी बातें सिखाएं ।अपने बड़ों को सम्मान करना ।उनके पैर छूकर उनके आशीर्वाद लेना ।ईश्वर पर विश्वास रखना और अपने कर्म को सदैव ईमानदारी से करते रहना.. ऐसे कुछ अच्छे गुण सिखाएं।

बच्चों के व्यवहार में नम्रता, विवेक, धीरज दूसरों के लिए करुणा के भाव हो, इससे बढ़कर एक व्यक्ति के चरित्र की  क्या  विशेषता हो सकती है???

आज भी जब हम हमारे बड़ों को देखते हैं तो हम हमारी जगह से उठकर खड़े हो जाते हैं ,उन्हें सम्मान देने के लिए। तो क्या कल हमारी आने वाली पीढ़ी ऐसा हमारे लिए करेगी ???आज हम अपने बड़ों की बातों को सुनते हैं ,समझते हैं ,हमारी बातों से उनका दिल ना दुखे इस बात की पूरी कोशिश करते हैं ।क्या हमारे बच्चे ऐसा करेंगे ???आज हम हमारे माता पिता को  सम्मान देते हैं ,आदर देते हैं। क्या आने वाली पीढ़ी वह आदर सम्मान हमें देगी ???

हां या  ना....

 जो भी जवाब होगा उस जवाब के लिए सिर्फ हम अभिभावक  जिम्मेदार होंगे बच्चे नहीं।

(इस रचना को अपना कीमती समय देने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद!)



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