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सिहासन हिलने लगा और ताज छीनने लगा....

मुंबई के 3BHK के फ्लैट में रहने वाले श्रीवास्तव परिवार के सभी लोग बहुत ही खुश थे, क्योंकि परिवार के बड़े बेटे अमन की शादी तय हो गई थी ।अमन के  मम्मी और पापा ने उसकी शादी अपनी  ही पसंद की लड़की से तय की थी ।अमन भी अपनी मां की पसंद से बहुत खुश था ।अमन की मां  सुघड़ महिला थी।  जिन्होंने घर की हर एक चीज को अपने हाथों से सजाया था। पूरा घर बहुत ही सुंदर लगता था।


 जहां मंजू अपने घर का ध्यान रखती ,वहीं अपनी सेहत का भी पूरा पूरा ध्यान रखती।


 अमन के पिता जी चंद्रशेखर अपनी खुद की कंपनी चलाते थे, लेकिन उनके दोनों बेटों ने नौकरी करना ही बेहतर समझा। चंद्रशेखर इस बात से बहुत ही खुश थे, कि उनके बेटों ने अपनी पसंद का काम चुना।


 अमन सॉफ्टवेयर कंपनी में काम करता था और छोटा बेटा आर्यन  सीए  था ।


अमन की शादी रिया नाम की एक बहुत ही सुशील लड़की से तय हुई थी। रिया अपने मम्मी पापा की इकलौती बेटी थी ।  तीन साल से वह भी काम कर रही थी। 


 अमन और रिया की शादी में अभी 3 महीने बाकी थे ।  रिया भोपाल में रहती थी ,इसलिए अमन और रिया आपस में ज्यादा नहीं मिल पाते थे, लेकिन उन दोनों के बीच काफी अच्छी बॉन्डिंग हो गई थी।


 रिया  ने तय किया कि शादी के बाद कुछ समय के लिए  वह नौकरी नहीं करेगी। वह भी अपनी शादीशुदा जिंदगी को इंजॉय करना चाहती थी।


 3 महीने शादी की तैयारियों में बस फटाफट चले गए ।रिया अमन की दुल्हन बन कर  मंजू जी के घर आ गई।


 रिया  बिल्कुल मंजू जी की परछाई बन गई। हर एक काम वह वैसे ही करने लगी जैसे मंजू किया करती थी ।चंद्रशेखर जी ,अमन और आर्यन को लगा ही नहीं कि रिया इस घर में अभी -अभी आई है ।मंजू जी भी इस बात से काफी खुश थी।


समय बीतने लगा ...अब हालात कुछ ऐसे हो गए कि घर के हर एक छोटे- बड़े  निर्णय  रिया लेने लगी ।आस-पड़ोस में होने वाले फंक्शंस में भी रिया के नाम से  इन्विटेशन आने लगे।  मंजू  की भी सारी सहेलियां मंजू के घर आती तो मंजू से कम और रिया से ज्यादा बातें करती।


  अमन के दोस्तों को भी  रिया के हाथ का खाना बहुत अच्छा लगने लगा ।कुल मिलाकर पूरे घर में रिया ..रिया ...के गुणगान होने  लगे ।


यह बात मंजू को खटकने लगी थी। ऐसा लगने लगा मानो की उसका सिहासन हिल रहा है और उसके सर से उसका ताज रिया छीन कर ले जा रही हैं।


 इसी उधेड़बुन में उसका स्वभाव बदलने लगा ।मंजू अब रिया  के हर एक काम में कमियां निकालने लगी। मंजू का  चिड़चिड़ापन बढ़ने लगा था ।घर के किसी भी सदस्य को उनका यह बदलता स्वभाव समझ में नहीं आ रहा था।


 लेकिन चंद्रशेखर जी शायद थोड़ा- थोड़ा समझने लगे थे ।जहां मंजू ने रिया के हाथ से किचन की बागडोर अपने हाथों में वापस ले ली, और घर के सारे छोटे -बड़े निर्णय भी अब वह फिर से खुद ही लेने लगी। तब रिया को बहुत अजीब लगने लगा ।उसे समझ ही नहीं आया कि कमी कहां रह जा रही है कि मां ऐसा कर रही है ।


खैर एक  दिन चंद्रशेखर जी ने शांति से मंजू को अपने पास बुलाया और उससे उसके ऐसे बर्ताव का कारण पूछा ।


मंजू ने कहा....." हां.. हां.. अब तो तुम्हें बस बहु ही अच्छी लगती है। मैंने तो अपनी सारी जिंदगी यूं ही बर्बाद कर दी ना ????तुम लोग तो ऐसे कर रहे हो जैसे मैंने इतने साल जो किया वह  फिजूल में ही किया।"


 तब चंद्रशेखर ने उसे समझाया..." मंजू ....मैं जानता हूं तुम गलत नहीं  हो ,लेकिन तुम्हें यह बात समझनी पड़ेगी कि जैसे  तुम्हे अपनी गृहस्थी   को अपने हिसाब से     चलाने का मौका मिला   ,अब रिया अपनी गृहस्थी चलाने की कोशिश कर रही है तो तुम्हें क्यों बुरा लग रहा है?????"
 तुम्हें याद है जब तुम शादी करके इस घर में आई थी तब मैंने तुमसे कहा था तुम जैसे चाहो वैसे इस घर को सजाओ। तो क्यों तुम नहीं ऐसा चाहती ???


यह कोई राजनीति नहीं है। जहां तुम एक कुर्सी पर बैठी हो ।और सारे घर पर हुकुम चलाना चाहती हो ।यह परिवार है ,इसमें पहले मां घर को  चलाती थी, फिर  तुमने इस घर को अपनी तरह से सजाया संवारा।


  अब तुम्हें खुले मन से इस घर को रिया के हाथों सौंप देना चाहिए ,क्योंकि अब यह उसका हक है।


 मंजू को यह बात पूरी तरह समझ में आ गई थी ।उसे समझ आ गया था कि उसे अब इस घर की बागडोर रिया को सौंप देनी चाहिए ।ऐसा नहीं है कि ऐसा करने से मंजू की इस घर में जो जगह है वह कम हो जाएगी। यह तो समय की मांग है और इसे स्वीकार कर लेना ही हर परिवार के लिए सुखद  है।




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