यदि आज से 20-25 साल पहले हम जाए ,तो हमें याद आता है कि कैसे अप्रैल और मई के महीने में हम सारे बच्चे अपने नाना-नानी के ,अपने मामा के घर जाने के लिए किस तरह अधीर हो उठते थे ।
सारी माएं अपने सूटकेस ऐसे बांधती थी जैसे कि एक मुक्त आकाश में उड़ने का मौका उन्हें दोबारा मिल रहा हो। मामा का घर मानो पूरी स्वतंत्रता , ढेर सारी खुशियां, ढेर सारी मस्ती का पर्याय बन जाता था।
फोन नही होते थे ,लेकिन पत्र के द्वारा मामा हमें बुलाया करते थे ।उन्हें हमारा इंतजार होता था। मम्मी भी पापा की सारी तैयारियां ठीक से कर देती थी।
स्टेशन पर गाड़ी रुके उसकी पहले हमारी नजर मामा को ही ढूंढा करती थी। सुबह के 5:00 बजे हो या रात के 12 ,स्टेशन पर मामा लेने जरूर आते थे ।उनका मुस्कुराता चेहरा देख मम्मी की सारी थकान मानो हवा में छू हो जाती थी। हम उछलकर उनकी गोद पर गिर जाते और उन्हें ऐसा लगता जैसे कि उनका घर हमसे ही तो है।
सारा सामान अपने ही कंधे पर उठाकर हमें घर तक ले जाते ।नाना -नानी ,मामी ,सारे बच्चे हमारे इंतजार में खड़े रहते। फिर क्या मस्ती,मज़ाक ,हल्ला गुल्ला का श्री गणेश हो जाया करता था।
मां को देखकर नाना -नानी के चेहरे पर खुशी आ जाती थी।जो शायद आज मुझे समझ में आती है ।तब तो हम नादान थे ।अपनी ही मस्ती में लगे रहते थे। कुछ बोले बगैर ही वे सब एक दूसरे को आंखों में ही बता दिया करते थे। मां का चेहरा देखकर नाना -नानी समझ जाते कि उनकी बेटी कितनी खुश है और कितनी उदास।
तब तो कभी ऐसा हुआ ही नहीं कि कौन सी चीज मेरी है कौन सी नहीं ...कौन सी चीज मामी से कहनी है ?कौन सी चीज छुपानी है?
छोटा-मोटा रूठना मनाना तो तब भी हुआ करता था। लेकिन उसकी वजह से कभी दिलों में दरार नहीं आती थी ।नाराजगी दो पल की होती थी, नई सुबह के साथ सब पुरानी बातें भूल जाते थे।
मामा का टोकरी भर कर आम लाना। मामी का हमें रोज आइसक्रीम खिलाना । नानी मां के हाथ के हलवे का स्वाद कौन भला भूल सकता है।हमारे शोरगुल से परेशान होकर नाना जी का हमें कभी-कभी डांटना और नानी का हमें पुचकार लेना ।
सारे बच्चों का सुबह उठकर एक साथ खेलना , एक साथ खाना खाना, एक साथ सोना, सब कुछ साथ साथ।बिजली चली जाए तो आंगन में या छत पर गद्दी लगा के सोना।
ना कोई नखरे ना कोई शिकायते ना कोई बड़ी बड़ी फरमाइशे करता। तब तो मॉल नहीं होते थे ।मल्टीप्लेक्स नहीं होते थे ।नाही गेम जोन हुआ करते थे। तब हम खेला करते थे ...सांप सीढ़ी ,लूडो ,क्रिकेट , गिली -डंडा ,कैरम ,कंचे ,लगोरी, खो -खो और न जाने कितने सारे ऐसे खेल जिनका तो कोई नाम भी नहीं था ।बस यूं ही खेला करते थे।
आज भी याद है वह टन- टन करते कुल्फी वाले का आना। लाल कपड़े में ढके हुए मटके में ढेर सारी कुल्फी रखना और सारे बच्चों का घर से एक साथ बाहर निकलना और चिल्लाना
आज भी याद है वह टन- टन करते कुल्फी वाले का आना। लाल कपड़े में ढके हुए मटके में ढेर सारी कुल्फी रखना और सारे बच्चों का घर से एक साथ बाहर निकलना और चिल्लाना
1 या ₹2 की ही कुल्फी आया करती थी। जिसमें एक आइसक्रीम स्टिक( जिसे हम तो लकड़ी कहा करते थे) लगी होती थी ।पर स्वाद इतना होता था ,आज भी वह स्वाद सभी की जुबां पर होगा।
बच्चों की लड़ाई में कभी मम्मी आई नहीं। सभी ने कहा सब मिलकर खेलो ।शायद कोई तीसरा दूर से देखे तो पता ही नहीं चलता कि किसका बच्चा कौन है??? सारे एक से कपड़े पहना करते। कभी मौसी के साथ, कभी मम्मी के साथ, कभी मामी के साथ हम दिखाई पड़ते। कोई गलती करे तो कोई भी बड़ा उसे डांट लगा देता।
मामा के साथ सर्कस और मेले में जाना।कलाबाजियां देख खूब तलिया बजाना।मेले में झूले झूलना ।
गर्मियां हो और आम ना हो ऐसा कैसे हो सकता है??? आपको याद आता है वह आम का खट्टा -मीठा अचार । आम के अचार को बड़ी-बड़ी बरनियो में भरा जाता था। पापड़ तो इतने सारे बनाए जाते थे, मानो पापड़ की फैक्ट्री खुल गई हो।एक अलग कमरा ही बना दिया जाता था।
हम २ सूटकेस ले जाते, लेकिन वापस आते तो ५-६ सूटकेस हो ही जाते।
आज मामा के घर की जगह शायद दूसरे बड़े बड़े दर्शनीय स्थलों ने ले ली।बड़े- बड़े शहरों में घूमने जाने की योजना बनाई जाती है। देश-विदेश के अच्छे से अच्छे होटलों में बुकिंग कराई जाती है। दो-तीन महीने पहले से ही वेकेशन की तैयारी हो जाती है।
ऐसा नहीं है कि इस तरह घूमना अच्छा नहीं लगता। बेशक नई जगह देखना किसी नहीं पसंद। अच्छे होटलों में रहना, अच्छा खाना खाना ,अच्छी-अच्छी तस्वीरें लेना हर किसी के मन को भाता है ।
लेकिन क्या होटल में आपको नानी के हाथ का हलवा मिल सकता है ? कोई होटल वाला आपका ऐसे स्वागत करेगा जैसे आपके मामा करते ? क्या कोई जगह ऐसी होगी जहां आप बेफिक्र होकर मस्ती कर सकते ?क्या आप मोबाइल के बिना अपना वकेशन बिता सकते है?
आज बच्चों का समर वैकेशन शुरू होता है टीवी से,मोबाइल से,लैपटॉप से, पी एस फोर से और शायद ख़तम भी ऐसे ही होता है।उनके लिए हम सबने हमारे पुराने खेलो को कभी दुबारा खेला ही नहीं।उनको कभी हमने सबके साथ एडजस्ट कैसे किया जाए ये सिखाया ही नहीं।
हम अक्सर शिकायत करते है कि बच्चे इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से चिपके रहते है।तो चलिए उनको भी हम हमारे खेल सिखाएं।उनको भी भाई बहनों के साथ रहने के मज़े लेना बताए।माना कि संयुक्त परिवार की जगह एकल परिवार ने ले ली है।
हम दिलों के बीच की दूरियों को कम करने की पहल तो कर ही सकते है।मनमुटाव छोड़ बच्चों की खुशी के लिए क्या हम अपना अहम दरकिनार नहीं कर सकते?
मामा के घर का मज़ा बच्चों को खुल के लेने का मौका दे।
ननद भी अपनी भाभी से दिल से मिले।बहने आपस में प्यार से रहे।पूरा साल तो सब अपने अपने घरों में अपने हिसाब से रहते है। लेकिन गर्मियों की छुट्टी हम वही पुराने मौज-मस्ती के साथ बिताए। भाई भाई भी अपने बीच की दूरियां दूर करके ससुराल से आई बहन और उनके बच्चों को प्यार से रखे। मामा का घर का पर्याय कभी भी कोई होटल नहीं हो सकता।

Very true... Same thinking was going on past few days
ReplyDeleteYeah...missing those days
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