चहचहाते हुए पक्षी ,बड़े-बड़े पेड़ ,ढेर सारे फूलों के पौधे, प्यारे -प्यारे मासूम बच्चे खेलते हुए ...
सब कुछ कितना प्यारा था |
लेकिन फिर भी न जाने क्यों शर्मा दंपत्ति दुखी नजर आ रहे थे???????
यूं तो वह अपने दोस्तों के साथ बगीचे में आए थे, लेकिन जहां सारे दोस्त हस बोल रहे थे ले ,वही शर्मा जी और उनकी पत्नी तनुजा दुखी लग रहे थे |
उन्हें कोई दुख भी हो सकता है, ऐसा कोई मान ही नहीं सकता था| शर्मा जी अपने बेटे -बहू ,पोती के साथ एक बहुत बड़े बंगले में रहते थे|
हर काम के लिए काम वाले लगे हुए थे| आने- जाने पर कोई पाबंदी नहीं थी|
जो चाहे वह कर सकते थे |तनुजा जी को तो एक कप चाय भी नहीं बनानी पड़ती थी| फिर क्या कारण था कि वह दोनों इतने दुखी थे????
तभी तिवारी जी की नजर शर्मा जी के चेहरे पर पड़ी तो उनसे रहा नहीं गया, उन्होंने हंसते हुए पूछा
"क्यों शर्मा आज क्यों दुखी दिखाई दे रहा है "???"
'अरे कुछ नहीं बस यूं ही।' शर्मा जी ने जवाब दिया
सभी लोगों ने उनके चेहरे पर दुख की रेखाओं को भांप लिया था |
लेकिन वह दोनों किसी को कुछ ना बोल पाए |
अपनी सैर खत्म करके भी दोनों घर लौट आए|
खाली घर मानो उन्हें काटने दौड़ रहा था | नाश्ता बना रखा था| लेकिन उनके साथ बैठ कर दो बोल बोलने वाला कोई नहीं था |
तनुजा ने हाथ -मुंह धोकर रसोई में जाकर देखा तो खाना बनाने वाली बाई ने आज फिर से दूध और ब्रेड मेज पर रखी थी|
सुबह से ही दोपहर का खाना तैयार था |
वहीं मोटी- मोटी चपाती जो शर्मा जी से नहीं खाई जाती| सब्जी ऐसी जिसमें ना तो कोई स्वाद था ना ही अपनापन |
तनुजा कुछ नहीं बोली और आकर बाहर बैठ गई |
तभी शर्मा जी बोले...' अरे चलो चाय पीते हैं |'
तनुजा बोली...' सुनिए जी मेरा मन नहीं लगता अब यहां......चलिए ना हम वापस चलते हैं| वहां कम से कम मेरी रसोई होगी |मैं अपने हिसाब से कुछ खाना बना पाऊंगी| यहां तो ना तो मुझे रसोई में कुछ बनाने दिया जाता है, ना ही मैं अपनी पसंद किसी को बता पाती हूं |'
शर्मा जी बोले ....कैसे जायेंगे वापस ???
जो कुछ था सब कुछ बेच के बेटे को दे दिया |यह सोचा था कि इतना पैसा है, बेटे को दे देते हैं| बेटे के बिजनेस में काम आ जाएगा |आखरी के हमारे दिन हमारे बेटे के साथ खुशी -खुशी बीत जाएंगे |
पर मुझे क्या पता था मेरी जिंदगी की वह सबसे बड़ी गलती होगी कि अपना सब कुछ अपने बेटे को दे दिया और अब मैं उसके ऊपर इस तरह आश्रित हो गया हूं| कि तुम्हें भी कुछ नहीं दे पाता हूं |ना तुम खुश रहती हो ना मैं|
जानता हूं पूरी जिंदगी नौकरी करके पैसा जमा किया, ताकि बेटे को अच्छी जिंदगी दे सके |
लेकिन यह नहीं पता था कि जब सब कुछ उसे दे दूंगा तो वह मात्र औपचारिकता के लिए मेरा सम्मान करेगा |
आशीष को बस ऐसा लगता है कि हमारा दो समय का खाना और सुबह का चाय -नाश्ता हमें मिल जाए तो हमें और कुछ नहीं चाहिए ।
लेकिन वह यह नहीं जानता कि उनका थोड़ा समय यदि हमें मिल जाए तो हमें अच्छा लगता ।
बहू को मैं दोष नहीं दे सकता ,क्योंकि वह क्या करें???
जब आशीष को ही ऐसा महसूस नहीं होता कि उसके मां-बाप यहां दो समय का खाना खाने के लिए नहीं बल्कि साथ -साथ समय बिताने के लिए आए हैं।
तुम परेशान मत हो तनूजा... मैं जल्दी ही कुछ करता हूं।
आज शाम को ही आशीष के साथ में बात करता हूं।
शाम होते ही आशीष घर आया ...आते ही अपना लैपटॉप लेकर कमरे में चला गया । बहू भी आई वह भी अपने काम में लग गई।
तभी शर्मा जी ने आशीष को आवाज़ लगाकर नीचे बुलाया।
आशीष बोला ..."अरे क्या है पापा???
जरूरी काम कर रहा हूं। खाना तो बना रखा है। आप खा लो।"
'
मैं और मेघना बाद में कमरे में ही खाना खा लेंगे।'
यह सुनते ही शर्मा जी की आवाज में गुस्सा आया उन्होंने कहा.... तुम्हें क्या लगता है??? सिर्फ दो टाइम खाना खाना ही हमारी जिंदगी है ....तुम अभी नीचे आओ मुझे तुमसे कुछ बात करनी है।
आशीष डरते हुए नीचे आया ...बोला..' क्या हुआ?? आज आप इतने गुस्से में क्यों है ????
शर्मा जी ने कड़क आवाज में कहा..." आशीष मेरी बात कान खोलकर आज तुम सुनो.... मैंने अपना सारा कुछ बेचकर तुम्हें जो पैसे दिए थे वह मुझे वापस दे दो।"
मैं वापस अपने गांव जाना चाहता हूं ।और वहां पर एक छोटा सा घर खरीद के तुम्हारी मां के साथ रहना चाहता हूं।
मैं यहां आया था सिर्फ तुम्हारे साथ रहने ना कि तुम्हारे दो टाइम का खाना खाने ।
तुम्हारे पास समय नहीं है ।तो फिर यहां रहने का हमारा कोई मतलब नहीं बनता।
मैं तुम्हें 10 दिन का समय देता हूं।
तुम मेरे पैसे अकाउंट में ट्रांसफर कर दो ।
मैं जानता हूं तुम्हारी जिंदगी में तुम्हारी अपनी परेशानियां है, अपनी मुश्किल है ।
मैं तुम्हारी मुश्किलें बढ़ाना नहीं चाहता ।
रहा सवाल हमारा तो वहां पर हम अपनी जिंदगी बड़े आराम से बिता सकते हैं ।
भगवान का शुक्र है कि अभी तेरी मां और मेरे हाथ- पैर सलामत है ।
ना तो अब मुझे तुम्हारा समय चाहिए ,ना ही तुम्हारा बंगला ,ना ही तुम्हारा सुबह से बना हुआ दिन- रात का खाना ।
ना मैं तुम्हें कोई दोष देना चाहता हूं ।ना ही अब यहां रह कर तेरी मां को और दुखी करना चाहता हूं ।तुम तुम्हारी जिंदगी में खुश रहो और हम हमारी जिंदगी में खुश रहेंगे।
तुम्हारी जिंदगी में शायद पैसा कमाना ही तुम्हारी प्राथमिकता हो गई है।अपने मां- बाप के लिए तुम्हारे पास समय नहीं है। तो बेशक तुम वही करो ।मैं तुम्हारे रास्ते में रुकावट नहीं बनूंगा । लेकिन एक बात याद दिला दूं पैसा तुम चाहे जितना कमा लो ,लेकिन रिश्ते नहीं कमा पाओगे ।
जिस तरह तुम्हारा काम समय मांगता है ,मेहनत मांगता है....
वैसे ही एक रिश्ता तभी मजबूत बनता है जब उसे
थोड़ा समय दिया जाए।
उस रिश्ते को प्यार दिया जाए ।
उस रिश्ते का सम्मान किया जाए ।
मेरी यह बात जरूर याद रखना।
मैं किसी को भी यह सलाह बिल्कुल नहीं दूंगा कि अपनी संपत्ति को अपने बच्चों को बिना सोचे- समझे दे दे और उन पर बोझ बन कर सारी जिंदगी परेशान होते रहे । बल्कि अपने आखिरी समय में अपने सारे शौक जो अधूरे थे पूरे करने चाहिए .........
👌
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