तकरीबन 10 दिन पहले हम हिमाचल प्रदेश घूमने गए थे .हम कुफरी में रुके. जहां तक नजर जाए सिर्फ बर्फ ही बर्फ...
पहाड़ों पर बर्फ ,सड़कों पर , पेड़ों पर बर्फ ,यहां तक कि घर की छत ,गाड़ियों ....तकरीबन हर जगह ...
ऐसा लग रहा था कि मानो कुफरी ,शिमला ने बर्फ की चादर ओढ़ ली हो .
सब कुछ सिर्फ सफेद ,सफेद और सफेद था.
यह खूबसूरत नजारा हमारी आंखों को ठंडक तो दे रहा था ,लेकिन ठंड इतनी कि हमारे ब् गर्म कपड़े भी उसे कम करने में शायद सक्षम नहीं हो पा रहे थे .
ऐसे में 1 दिन बिताने के बाद हमें कुफरी से शिमला जाना था ,इसका रास्ता तकरीबन एक घंटा था. किसी भी गाड़ी का इतनी बर्फ में शिमला तक जाना पॉसिबल नहीं था. हमारी रिक्वेस्ट मान कर होटल के मैनेजर ने होटल की एक गाड़ी की व्यवस्था की. तकरीबन 35 -40 साल के दो आदमी लगातार एक गाड़ी के ऊपर गर्म पानी डालकर उसके इंजन को गर्म करने की कोशिश कर रहे थे.
हम गर्म कपड़ों में .. उन्हें देख रहे थे.....
45 मिनट की मेहनत के बाद गाड़ी स्टार्ट हो गई .इन दो आदमियों को बिल्कुल नहीं पता था कि इतनी मेहनत करने के बाद उन्हें क्या मिलने वाला था??? लेकिन यही कह रहे थे.." सर आप परेशान ना हो !हम आपको ठीक से शिमला तक पहुंचा देंगे .उनकी यह बात मुझे बहुत अच्छी लगी. रास्ता इतना सकरा की केवल एक गाड़ी या आ सकती थी या जा सकती थी. ऊंचे -नीचे रास्ते जहां एक गाड़ी आ रही थी, तो फिर दूसरी गाड़ी को रुकना पड़ रहा था.
हमारी गाड़ी को चलाने वाले ड्राइवर हमारी ही गाड़ी को रोककर दूसरों की गाड़ी को बर्फ में से निकालते, उन्हें रास्ता देते और आगे बढ़ते .
मुझे आश्चर्य हुआ थोड़ा सा गुस्सा भी आया ..कि यदि वह दूसरों को रास्ता देंगे तो हम कब पहुंचेंगे मैंने उन्हें कहा आप 'आप चलिए दूसरों को छोड़िए '.
उन्होंने मुझसे कहा "मैडम ...यह बर्फ की वादियां है, एक दूसरे की मदद करनी होती है ..एक गाड़ी निकलेगी तभी दूसरी गाड़ी जा पाएगी . वरना सब यही परेशान हो जाएंगे."
उस आदमी के चेहरे पर ना कोई शिकन थी. ना गुस्सा ना झुंझलाहट ना कोई गाली .
इसके विपरीत जब हम मुंबई ,पुणे ,बैंगलोर जैसे बड़े शहरों में अपनी ऐ.सी. गाड़ी में बैठते हैं और ट्रैफिक जाम हो जाता है तो चाहे ना चाहे गाली निकल जाती हैं. Horn के ऊपर हाथ आ ही जाता है . चिड़चिड़ापन स्वाभाविक हो जाता है....
लेकिन जीरो डिग्री टेंपरेचर पर उस आदमी की यह बात दिल को छू गई....
इतनी विपरीत परिस्थितियों में .. मुश्किल रास्तों पर, इतनी कम सुविधाओं के बीच रहने वाले लोग, कितना अपनापन दिखाते हैं एक दूसरे के लिए .एक दूसरे की मदद करते हैं ...और हम दूसरों को पीछे छोड़ कर खुद आगे निकल जाना चाहते हैं.......
पहाड़ों पर बर्फ ,सड़कों पर , पेड़ों पर बर्फ ,यहां तक कि घर की छत ,गाड़ियों ....तकरीबन हर जगह ...
ऐसा लग रहा था कि मानो कुफरी ,शिमला ने बर्फ की चादर ओढ़ ली हो .
सब कुछ सिर्फ सफेद ,सफेद और सफेद था.
यह खूबसूरत नजारा हमारी आंखों को ठंडक तो दे रहा था ,लेकिन ठंड इतनी कि हमारे ब् गर्म कपड़े भी उसे कम करने में शायद सक्षम नहीं हो पा रहे थे .
ऐसे में 1 दिन बिताने के बाद हमें कुफरी से शिमला जाना था ,इसका रास्ता तकरीबन एक घंटा था. किसी भी गाड़ी का इतनी बर्फ में शिमला तक जाना पॉसिबल नहीं था. हमारी रिक्वेस्ट मान कर होटल के मैनेजर ने होटल की एक गाड़ी की व्यवस्था की. तकरीबन 35 -40 साल के दो आदमी लगातार एक गाड़ी के ऊपर गर्म पानी डालकर उसके इंजन को गर्म करने की कोशिश कर रहे थे.
हम गर्म कपड़ों में .. उन्हें देख रहे थे.....
45 मिनट की मेहनत के बाद गाड़ी स्टार्ट हो गई .इन दो आदमियों को बिल्कुल नहीं पता था कि इतनी मेहनत करने के बाद उन्हें क्या मिलने वाला था??? लेकिन यही कह रहे थे.." सर आप परेशान ना हो !हम आपको ठीक से शिमला तक पहुंचा देंगे .उनकी यह बात मुझे बहुत अच्छी लगी. रास्ता इतना सकरा की केवल एक गाड़ी या आ सकती थी या जा सकती थी. ऊंचे -नीचे रास्ते जहां एक गाड़ी आ रही थी, तो फिर दूसरी गाड़ी को रुकना पड़ रहा था.
हमारी गाड़ी को चलाने वाले ड्राइवर हमारी ही गाड़ी को रोककर दूसरों की गाड़ी को बर्फ में से निकालते, उन्हें रास्ता देते और आगे बढ़ते .
मुझे आश्चर्य हुआ थोड़ा सा गुस्सा भी आया ..कि यदि वह दूसरों को रास्ता देंगे तो हम कब पहुंचेंगे मैंने उन्हें कहा आप 'आप चलिए दूसरों को छोड़िए '.
उन्होंने मुझसे कहा "मैडम ...यह बर्फ की वादियां है, एक दूसरे की मदद करनी होती है ..एक गाड़ी निकलेगी तभी दूसरी गाड़ी जा पाएगी . वरना सब यही परेशान हो जाएंगे."
उस आदमी के चेहरे पर ना कोई शिकन थी. ना गुस्सा ना झुंझलाहट ना कोई गाली .
इसके विपरीत जब हम मुंबई ,पुणे ,बैंगलोर जैसे बड़े शहरों में अपनी ऐ.सी. गाड़ी में बैठते हैं और ट्रैफिक जाम हो जाता है तो चाहे ना चाहे गाली निकल जाती हैं. Horn के ऊपर हाथ आ ही जाता है . चिड़चिड़ापन स्वाभाविक हो जाता है....
लेकिन जीरो डिग्री टेंपरेचर पर उस आदमी की यह बात दिल को छू गई....
इतनी विपरीत परिस्थितियों में .. मुश्किल रास्तों पर, इतनी कम सुविधाओं के बीच रहने वाले लोग, कितना अपनापन दिखाते हैं एक दूसरे के लिए .एक दूसरे की मदद करते हैं ...और हम दूसरों को पीछे छोड़ कर खुद आगे निकल जाना चाहते हैं.......

Very true and though i was with you never realized it.
ReplyDeleteNice
ReplyDeleteVery true
ReplyDeleteThx
Delete