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जिद्दी ...!बच्चे या फिर हम????

अरे क्या बताऊं.... मेरा बेटा बहुत जिद्दी है.  मॉल जाओ तो उसे जरूर कुछ ना कुछ चाहिए .टॉय शॉप में जाओ तो खिलौने चाहिए. बस रो रो कर जिद करने लगता है फिर तो मुझे बस  थप्पड़ लगाने पड़ते हैं.

यह शायद अक्सर आपने सुना होगा . काफी सारी  मां कहती है 'अरे यह बहुत जिद्दी हो गया है आजकल.'

1 मिनट के लिए सोचे आप खिलौने की दुकान पर हैं आपके बच्चे ने आपसे कहा "मम्मी! मुझे यह चाहिए. जाने सोचे समझे बगैर आप कहते हैं" नहीं "अभी नहीं.
बाद में बच्चा फिर कहता है 'मुझे चाहिए '.
आप कहते ...नहीं कहा ना तुमसे.
आपका बच्चा फिर आपसे कहता है  मम्मी ले दो . और फिर जोर -जोर से रोने लगता है .आप कहती... नहीं अभी नहीं. अभी तो खरीदा था. घर जाकर क्या करोगे बस 2 दिन खेलोगे फिर तोड़ दोगे.
बच्चा चाहिए ..चाहिए ..चाहिए ..कि जिद करता है. और आप उसे ..नहीं ..नहीं ..नहीं ..कहते हैं.
वह खिलौने खरीदने की जिद करता है ..और आप उसे खिलौना ना दिलाने की ज़िद करते हैं...

पहली बार में यदि आप उसे ना कहने की जगह उसे प्यार से समझाएं ..
अपने ना कहने का कारण बताएं कि आप वह खिलौना उसे क्यों नहीं खरीदकर देना चाहते.....

हमारे साथ भी ऐसा होता है हमें कुछ पसंद आता है मगर हम उसे नहीं खरीद पाते .थोड़े दुखी हो जाते हैं. लेकिन जब कोई कहता है अच्छा हुआ नहीं खरीदा क्योंकि उससे अच्छा ऑप्शन है .
बच्चों के साथ भी यही ट्रिक काम करती है. उसे कोई दूसरा बेटर ऑप्शन मिले तो उसे खरीदने की ज़िद छोड़ देगा .
जैसे आप उसे कहें कि आप उसे गार्डन में क्रिकेट खेलने ले जायेंगे या उसे क्ले से घर बनाना सिखाएंगे या आप उसे कहें कि आप उसके फेवरेट कार्टून की पिक्चर बनाना सिखाएंगे.

बच्चों की ज़िद के सामने आपकी ज़िद काम नहीं करेगी इसलिए उनके साथ आप जिद्दी मत बनिए कुछ बेहतर ऑप्शन ढूंढने की कोशिश करिए.

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