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सुपर वुमन

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि महिलाएं मल्टीटास्किंग होती हैं.
एक समय पर एक से ज्यादा काम बखूबी निभाती हैं.
मल्टीटास्किंग होना बहुत अच्छी बात है लेकिन खुद को Superwoman समझना शायद खुद के लिए भी अच्छा नहीं ...
क्या आपने कभी ध्यान से सोचा है की  पत्नियां या महिलाएं हर एक काम को सलीके से करती हैं....
चाहे वह बेड पर चादर बिछाना हो या कपड़ों को तह करना .
क्रोकरी अरेंज करना हो ,किताबे जमाना ,खाना टेबल पर लगाना ,पौधों को पानी देना. महिलाओं को यह लगता है कि कोई भी काम जो वह करती है उसका तरीका सबसे सही है .उसके अलावा यदि कोई वह काम करें तो उन्हें पसंद नहीं आता .
स्वाभाविक है जब आप किसी के काम करने पर  टोकेंगे तो वह दोबारा काम बिल्कुल नहीं करेगा .
और आप ही उसे कहेंगे "रहने दीजिए ...आप से नहीं होगा मैं ही कर देती हूं."
इस वजह से सारे काम दौड़ -दौड़ कर खुद करने लगती है .

इसके बदले में क्या मिलेगा . गुस्सा ,झुंझलाहट परेशानियां....
ना तो हमें खुशी मिलेगी ना ही परिवार का कोई सदस्य इससे खुश हो पाएगा.
थोड़ा सा नजरिया बदलना होगा, अपनी प्राथमिकताओं को समझना होगा...
फिर क्या हुआ जो कपड़ो की तह थोड़ी ठीक से नहीं हुई .
कुछ नहीं बिगड़ेगा यदि पुस्तकें अलमारी में ऊपर नीचे जम गई ..
  यदि जूतों की अलमारी में जूते थोड़े अस्त-व्यस्त हो जाएं.....फर्क नहीं पड़ता.
हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए  'क्वालिटी टाइम 'जो हम अपने परिवार के साथ बिता सकें ...........

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