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हसीन लमहे....(page 3)

हां ,हां ..स्वाति मैं यहां ठीक से पहुंच गया हूं.
तुम कैसी हो??? अमित ..मेरी जान में जान आई .तुम ठीक हो ना ?? स्वाति ने फिकर जताते हुए पूछा
मैं ठीक हूं तुम अपना ध्यान रखना.
मैं तुम्हें email करता हूं यह कहकर अमित ने फोन रख दिया .
फिर भी स्वाति काफी देर  तक फोन का रिसीवर पकड़े बैठे रही ..
न जाने उसे कितनी सारी बातें करनी थी.
अमित ऑफिस पहुंच गया जरूरत के काम निपटा कर, उसने अपना दिन शुरू किया.
 स्वाति की  भी जान में जान आ गई थी.
वह भी अपने ऑफिस के काम में लग गई .

कहते हैं कि समय हर दर्द की दवा है .
वैसे ही दिन बीतने लगे और दोनों अपने अपने कामों में लग गए.
दोनों कभी फोन पर तो ,कभी मेल पर बात कर लेते थे  .
स्वाति ऑफिस का सारा काम घर ले आती थी, क्योंकि अमित के बगैर घर उसे खाने को दौड़ता था .

लंदन के ऑफिस में  अमित नए नए दोस्त बनाने लगा, घुलने मिलने लगा ,सबसे नया काम सीखने लगा .
अमित की दोस्ती आशीष से हो गई .
आशीष ने कहा कि..' मैं तुम्हें अपनी टीम से मिलाता हूं.'
मीटिंग रूम में अमित सब का इंतजार करने लगा  एक एक करके वह सभी से मिला .
तभी अचानक उसके कंधे पर किसी ने हाथ रख कर कहा ....'हेलो !..अमित ..'हाउ आर यू .....?'
अमित चौक गया उसने पीछे मुड़कर देखा ..
तो एक जाना पहचाना चेहरा सामने आया. वह कुछ सोच पाता इसके पहले वह बोली अरे ?अमित तुमने मुझे नहीं पहचाना ??मैं रचना हूं .
अमित चौक कर बोला अरे हां !!तुम यहां कैसे ??
रचना ने कहा मैं यहां 2 साल से हूं .
तुम कैसे हो??
अमित ने कहा मैं ठीक हूं.
रचना ने पूछा और स्वाति कैसी है?
अमित ने उसे बताया कि उसकी शादी स्वाति से हो गई है .
यह सुनकर रचना कुछ ज्यादा खुश नहीं हुई .
वह बोली चलो फिर मिलेंगे .
अमित ने रचना को देखा ...रचना फॉर्मल कपड़ों में थी, बालों को उसने बांध रखा था और काफी अच्छी पोस्ट पर वह उस ऑफिस में काम कर रही थी. शाम होते ही अमित ने स्वाति को मेल लिखकर बताया कि वह रचना से मिला .मेल के इंतजार में बैठी स्वाति ने जैसे ही रचना का नाम  पढ़ा वह चौक गई अब न जाने क्यों उसे अजीब सा लगने लगा.....
उसे यह डर सताने लगा .....
(क्या अमित और स्वाति की जिंदगी में रचना की वजह से कोई तूफान आएगा या यह स्वाति का केवल एक डर है जानने के लिए पढ़िए अगला ब्लॉग........)

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